श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 53

 
श्लोक
अहो अकरुणो देव: स्त्रियाकरुणया विभु: ।
कृपणं मामनुशोचन्त्या दीनया किं करिष्यति ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—ओह; अकरुण:—अत्यन्त क्रूर; देव:—विधाता; स्त्रिया—मेरी पत्नी से; आकरुणया—जो अत्यन्त करुणापूर्ण; विभु:—परमेश्वर; कृपणम्—बेचारा; माम्—मेरे लिये; अनुशोचन्त्या—शोक करती; दीनया—बेचारी; किम्—क्या; करिष्यति—करेगा ।.
 
अनुवाद
 
 ओह! विधाता कितना क्रूर है। मेरी पत्नी असहाय होने से ही ऐसी विषम स्थिति में है—और मेरे लिए विलाप कर रही है। भला विधाता इस बेचारे मादा पक्षी को लेकर क्या पाएगा? उसे क्या लाभ होगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥