श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 55

 
श्लोक
कथं त्वजातपक्षांस्तान् मातृहीनान् बिभर्म्यहम् ।
मन्दभाग्या: प्रतीक्षन्ते नीडे मे मातरं प्रजा: ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
कथम्—कैसे; तु—लेकिन; अजात-पक्षान्—जिनके उडऩे के पंख अभी नहीं उगे; तान्—उन; मातृ-हीनान्—माता से बिछुड़े हुओं को; बिभर्मि—पालन करूँगा; अहम्—मैं; मन्द-भाग्या:—अत्यन्त अभागे; प्रतीक्षन्ते—वे प्रतीक्षा करते हैं; नीडे—घोंसले में; मे—मेरे; मातरम्—अपनी माता की; प्रजा:—पक्षी के बच्चे ।.
 
अनुवाद
 
 पक्षी के अभागे बच्चे मातृविहीन होकर अपने घोंसले में उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह आए तो उन्हें खिलाए। वे अब भी बहुत छोटे हैं और उनके पंख तक नहीं उगे हैं। मैं उनका किस प्रकार पालन कर सकूँगा?
 
तात्पर्य
 नर पक्षी अपने बच्चों की माता के लिए शोक कर रहा है, क्योंकि माता ही बच्चों का पालन करती है और उनकी सुरक्षा करती है। लेकिन यमराज ने एक छोटे बालक के वेष में पहले ही बता दिया है कि यद्यपि उसकी माता ने उसे बिना किसी देखरेख के जंगल में घूमता छोड़ दिया था, किन्तु भेडिय़ा तथा अन्य हिंसक पशुओं ने उसे नहीं खाया था। असली तथ्य यह है कि यदि भगवान् किसी की रक्षा करते हैं, तो वह भले ही मातृविहीन तथा पितृविहीन ही क्यों न हो, ईश्वर की इच्छा से उसका पालन हो ही जाता है। अन्यथा यदि परमेश्वर रक्षा नहीं करते तो माता-पिता के होते हुए भी मनुष्य को कष्ट भोगना पड़ता है। दूसरा उदाहरण उस रोगी का है, जो उत्तम वैद्य तथा उत्तम औषधि के होने पर भी कभी-कभी मर जाता है। इस प्रकार भगवान् की रक्षा के बिना कोई जीवित नहीं कर सकता, चाहे उसके माता-पिता हों अथवा न हों।
इस श्लोक की दूसरी बात यह है कि पक्षी तथा पशु समाज में भी बच्चों के लिए माता-पिता में सुरक्षा की भावना होती है—मानव समाज के विषय में तो क्या कहा जाये? किन्तु कलियुग में मनुष्य इतना पतित हो चुका है कि माता-पिता अपने बच्चों को गर्भ में ही विज्ञान का यह बहाना लेकर मार डालते हैं कि गर्भ के भीतर बालक में कोई प्राण नहीं होता। चूँकि अत्यन्त प्रशिक्षित चिकित्सक ऐसा अभिमत देते हैं, अतएव आजकल के माता-पिता अपने बच्चों को गर्भ में ही मार डालते हैं। मानव समाज कितना पतित हो चुका है! उनका वैज्ञानिक ज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है कि वे अंडे तथा भ्रूण के भीतर जीवन नहीं मानते। अब ये तथाकथित विज्ञानी रासायनिक विकास का सिद्धान्त प्रस्तुत करने के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर रहे हैं। किन्तु यदि रासायनिक संयोग ही जीवन के स्रोत हैं, तो फिर सारे विज्ञानी रसायनशास्त्र के बल पर अंडा जैसी कोई वस्तु निर्मित क्यों नहीं कर लेते और उसे इनक्युबेटर में रख कर उससे चुज़ा क्यों नहीं निकाल लेते? उनका उत्तर क्या है? वे अपने वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर एक अंडा तक नहीं उत्पन्न कर सकते। ऐसे विज्ञानियों को भगवद्गीता में माययापहृतज्ञाना: कहा गया है अर्थात् ऐसे मूर्ख जिनके असली ज्ञान को हर लिया गया हो। ये ज्ञानी पुरुष होने का नहीं, अपितु विज्ञानी तथा दार्शनिक होने का स्वांग भरते हैं, यद्यपि उनके तथाकथित सैद्धान्तिक ज्ञान से व्यावहारिक परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥