श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 2: असुरराज हिरण्यकशिपु  »  श्लोक 9

 
श्लोक
तस्मिन् कूटेऽहिते नष्टे कृत्तमूले वनस्पतौ ।
विटपा इव शुष्यन्ति विष्णुप्राणा दिवौकस: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—जब वह; कूटे—अत्यन्त मायावी; अहिते—शत्रु; नष्टे—नष्ट हो जाता है; कृत्त-मूले—जड़ें कट जाने पर; वनस्- पतौ—वृक्ष; विटपा:—डालें तथा पत्तियाँ; इव—सदृश; शुष्यन्ति—सूख जाती हैं; विष्णु-प्राणा:—जिनका प्राण विष्णु है; दिव-ओकस:—देवतागण ।.
 
अनुवाद
 
 जब वृक्ष की जड़ काट दी जाती है, तो वह गिर पड़ता है और उसकी शाखायें एवं पत्तियाँ स्वयमेव सूख जाती हैं। उसी तरह जब मैं इस मायावी विष्णु को मार डालूँगा तो सारे देवता, जिनके लिए भगवान् विष्णु प्राण तथा आत्मा हैं, अपना जीवन-स्रोत खो देंगे और मुरझा जाएँगे।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर देवताओं तथा असुरों का अन्तर बताया गया है। देवता सदैव भगवान् के आदेशों का पालन करते हैं जबकि असुरगण उन्हें क्षुब्ध करने या मारने की योजना बनाते
हैं। फिर भी कभी- कभी असुरगण देवताओं की भगवत्कृपा पर पूर्ण निर्भरता की प्रशंसा करते हैं। यह असुरोंद्वारा देवताओं का अप्रत्यक्ष महिमा-गायन है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥