श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 18

 
श्लोक
अद्राक्षमहमेतं ते हृत्सारं महदद्भ‍ुतम् ।
दंशभक्षितदेहस्य प्राणा ह्यस्थिषु शेरते ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
अद्राक्षम्—स्वयं देखा है; अहम्—मैंने; एतम्—यह; ते—तुम्हारी; हृत्-सारम्—सहन शक्ति; महत्—अत्यधिक; अद्भुतम्— आश्चर्यजनक; दंश-भक्षित—कीड़ों तथा चीटियों से खायी हुई; देहस्य—देह का; प्राणा:—प्राण, प्राणवायु; हि—निस्सन्देह; अस्थिषु—हड्डियों में; शेरते—शरण ले रहा है ।.
 
अनुवाद
 
 मैं तुम्हारे धैर्य को देखकर अत्यन्त विस्मित हूँ। सभी तरह के कीड़ों तथा चीटियों द्वारा खाये तथा काटे जाने के बावजूद तुम अपनी अस्थियों में प्राणवायु को संचालित किये हुए हो। निस्सन्देह, यह आश्चर्यजजनक है।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि आत्मा का अस्तित्व अस्थियों में भी हो सकता है जैसाकि हिरण्यकशिपु के निजी उदाहरण से दर्शित होता है। जब बड़े-बड़े योगी समाधि में रहते हैं, तो उनके शरीर भूमि में गड़े रहने पर उनकी खाल, मज्जा, रक्त इत्यादि खाये जाने पर भी, यदि उनकी हड्डियाँ बची रहती हैं, तो वे दिव्य पद पर विद्यमान रह सकते हैं। हाल ही में एक पुरातत्वविद ने अपनी खोज प्रकाशित
की है, जिसमें सूचित किया गया है कि भूमि में गाड़े जाने के बाद क्राइस्ट को खोद निकाला गया और तब वे कश्मीर गये। योगियों के ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त हैं जब वे समाधि में गाड़ दिये गये और कई घन्टों के बाद अच्छी अवस्था में जीवित निकाल लिए गये। योगी अपने को दिव्य अवस्था में जीवित रख सकता है भले ही उसे कई दिनों के लिए क्या वर्षों तक क्यों न गाड़ कर रखा जाये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥