श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 25

 
श्लोक
उत्थाय प्राञ्जलि: प्रह्व ईक्षमाणो द‍ृशा विभुम् ।
हर्षाश्रुपुलकोद्भ‍ेदो गिरा गद्गदयागृणात् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
उत्थाय—उठकर; प्राञ्जलि:—हाथ जोड़े; प्रह्व:—विनीत भाव से; ईक्षमाण:—देखते हुए; दृशा—अपनी आँखों से; विभुम्—इस ब्रह्माण्ड के भीतर परम पुरुष को; हर्ष—प्रसन्नता के; अश्रु—आँसुओं से; पुलक—शरीर में रोमांच; उद्भेद:—सजीव; गिरा— शब्दों से; गद्गदया—रुक-रुक कर; अगृणात्—प्रार्थना की ।.
 
अनुवाद
 
 तब दैत्यराज भूमि से उठकर एवं ब्रह्माजी को अपने समक्ष देखकर प्रसन्नता से अभिभूत हो गया। वह अश्रुपूर्ण नेत्रों एवं कम्पित पुलकित शरीर से अपने हाथ जोडक़र तथा अवरुद्ध वाणी से ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए विनीत मुद्रा में प्रार्थना करने लगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥