श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 29

 
श्लोक
त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च
प्राणेन मुख्येन पति: प्रजानाम् ।
चित्तस्य चित्तैर्मनइन्द्रियाणां
पतिर्महान् भूतगुणाशयेश: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; ईशिषे—वास्तविक नियंत्रण करते हो; जगत:—चल प्राणियों का; तस्थुष:—एक स्थान पर स्थिर रहने वालों का; च—तथा; प्राणेन—प्राण से; मुख्येन—समस्त कार्यकलापों का उद्गम; पति:—स्वामी; प्रजानाम्—समस्त जीवों का; चित्तस्य—मन का; चित्तै:—चेतना से; मन:—मन का; इन्द्रियाणाम्—तथा दो प्रकार की इन्द्रियों (कर्मेन्द्रियाँ तथा ज्ञानेन्द्रियाँ) का; पति:—स्वामी; महान्—महान्; भूत—भौतिक तत्त्वों का; गुण—तथा भौतिक तत्त्वों के गुण; आशय—इच्छाओं का; ईश:—परम स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 “आप ही इस भौतिक जगत के जीवन के उद्गम होने से चर तथा अचर दोनों प्रकार के जीवों के स्वामी तथा नियन्ता हैं और उनकी चेतना को प्रेरित करते रहते हैं। आप मन और कर्म तथा ज्ञान की इन्द्रियों को धारण करते हैं अतएव आप समस्त भौतिक तत्त्वों तथा उनके गुणों के महान् नियन्ता हैं। आप समस्त इच्छाओं के भी नियन्ता हैं।”
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में स्पष्ट इंगित किया गया है कि प्रत्येक वस्तु का मूल स्रोत जीवन है। ब्रह्मा को परम पुरुष कृष्ण ने उपदेश दिया था। कृष्ण परम पुरुष हैं (नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् ) और ब्रह्मा भी जीव हैं लेकिन ब्रह्मा के मूल स्रोत कृष्ण ही हैं। अतएवभगवद्गीता (७.७) में कृष्ण
कहते हैं—मत्त: परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय—“हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ सत्य कोई नहीं है।” कृष्ण ब्रह्माजी के मूल स्रोत हैं, जो इस ब्रह्माण्ड के मूल स्रोत हैं। ब्रह्माजी कृष्ण के प्रतिनिधि हैं, अतएव कृष्ण के सारे गुण तथा कार्यकलाप ब्रह्माजी में भी पाये जाते हैं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥