श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 3

 
श्लोक
जटादीधितिभी रेजे संवर्तार्क इवांशुभि: ।
तस्मिंस्तपस्तप्यमाने देवा: स्थानानि भेजिरे ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
जटा-दीधितिभि:—सिर पर जटा के तेज से; रेजे—चमक रहा था; संवर्त-अर्क:—प्रलयकालीन सूर्य; इव—सदृश; अंशुभि:— किरणों से; तस्मिन्—जब वह (हिरण्यकशिपु); तप:—तपस्या में; तप्यमाने—लगा था; देवा:—सारे देवता जो हिरण्यकशिपु के आसुरी कृत्यों को देखने के लिए सारे ब्रह्माण्ड में घूम रहे थे; स्थानानि—अपने-अपने स्थानों को; भेजिरे—लौट गये ।.
 
अनुवाद
 
 हिरण्यकशिपु के जटाजूट से प्रलयकालीन सूर्य की किरणों के समान प्रकाशमान तथा असह्य तेज प्रकट हुआ। ऐसी तपस्या देखकर सारे देवता, जो अभी तक सारे लोकों में भ्रमण कर रहे थे, अपने-अपने घरों को लौट गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥