श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 32

 
श्लोक
त्वत्त: परं नापरमप्यनेज-
देजच्च किञ्चिद्‌‌व्यतिरिक्तमस्ति ।
विद्या: कलास्ते तनवश्च सर्वा
हिरण्यगर्भोऽसि बृहत्‍त्रिपृष्ठ: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
त्वत्त:—तुमसे; परम्—उच्चतर; न—नहीं; अपरम्—निम्नतर; अपि—भी; अनेजत्—अचर; एजत्—चर; च—तथा; किञ्चित्—कोई वस्तु; व्यतिरिक्तम्—पृथक्; अस्ति—है; विद्या:—विद्या, ज्ञान; कला:—अंश; ते—तुम्हारे; तनव:—शरीर के लक्षण; च—तथा; सर्वा:—सभी; हिरण्य-गर्भ:—अपने उदर में ब्रह्माण्ड को रखने वाला; असि—तुम हो; बृहत्—बड़े से बड़ा; त्रि-पृष्ठ:—प्रकृति के तीन गुणों से परे ।.
 
अनुवाद
 
 “आपसे पृथक् कुछ भी नहीं है चाहे वह अच्छा हो या निम्नतर, अचर या चर। वैदिक वाङ्मय से यथा उपनिषदों से तथा मूल वैदिक ज्ञान के उपायों से प्राप्त ज्ञान आपके बाह्य शरीर की रचना करने वाले हैं। आप हिरण्यगर्भ अर्थात् ब्रह्माण्ड के आगार हैं, लेकिन परम नियन्ता के रूप में स्थित होने से आप तीन गुणों से युक्त भौतिक जगत से परे हैं।
 
तात्पर्य
 परम शब्द का अर्थ हैं “परम कारण” तथा अपरम् का अर्थ है “कार्य”। परम कारण तो भगवान् हैं और भौतिक प्रकृति कार्य है। चर तथा अचर दोनों प्रकार के जीव कला एवं विज्ञान विषयक वैदिक आदेशों से नियंत्रित होते हैं, अतएव वे सभी भगवान् की बहिरंगा शक्ति के विस्तार हैं, जो परमात्मा के रूप में केन्द्रित
हैं। ब्रह्माण्डों का अस्तित्व परमेश्वर के श्वसनकाल तक रहता है (यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथा:)। इस प्रकार ये ब्रह्माण्ड भी भगवान् महाविष्णु के गर्भ के भीतर रहते हैं। अतएव कुछ भी भगवान् से पृथक् नहीं है। अचिन्य भेदाभेदतत्त्व का दर्शन यही है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥