श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 37-38

 
श्लोक
व्यसुभिर्वासुमद्भ‍िर्वा सुरासुरमहोरगै: ।
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे ऐकपत्यं च देहिनाम् ॥ ३७ ॥
सर्वेषां लोकपालानां महिमानं यथात्मन: ।
तपोयोगप्रभावाणां यन्न रिष्यति कर्हिचित् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
व्यसुभि:—निर्जीव वस्तुओं द्वारा; वा—अथवा; असुमद्भि:—सजीवों द्वारा; वा—अथवा; सुर—देवताओं द्वारा; असुर—दैत्यों द्वारा; महा-उरगै:—अधोलोक में वास करने वाले बड़े-बड़े सर्पों द्वारा; अप्रतिद्वन्द्वताम्—जिसकी बराबरी करने वाला न हो; युद्धे—युद्ध में; ऐक-पत्यम्—श्रेष्ठता; च—तथा; देहिनाम्—भौतिक शरीरधारियों के ऊपर; सर्वेषाम्—सभी; लोक- पालानाम्—समस्त लोकों के प्रधान देवताओं का; महिमानम्—यश; यथा—जिस तरह; आत्मन:—आपका; तप:-योग- प्रभावाणाम्—उन सबों का जिन्हें तपस्या तथा योगाभ्यास द्वारा शक्ति प्राप्त होती है; यत्—जो; न—कभी नहीं; रिष्यति—नष्ट होती है; कर्हिचित्—कभी भी ।.
 
अनुवाद
 
 आप मुझे वर दें कि किसी सजीव या निर्जीव प्राणी द्वारा मेरी मृत्यु न हो। मुझे यह भी वर दें कि मैं किसी देवता या असुर द्वारा या अधोलोकों के किसी बड़े सर्प द्वारा न मारा जाऊँ। चूँकि आपको युद्धभूमि में कोई मार नहीं सकता इसलिए आपका कोई प्रतिद्वन्द्वी भी नहीं है। इसी प्रकार आप मुझे यह भी वर दें कि मेरा भी कोई प्रतिद्वन्द्वी न हो। मुझे सारे जीवों तथा लोकपालों का एकछत्र स्वामित्व प्रदान करें और उस पद से प्राप्त होने वाला समस्त यश दें। साथ ही मुझे लम्बी तपस्या तथा योगाभ्यास से प्राप्त होने वाली सारी योग शक्तियाँ दें, क्योंकि ये कभी भी विनष्ट नहीं हो सकतीं।
 
तात्पर्य
 ब्रह्माजी को अपना श्रेष्ठ पद लम्बी तपस्या, योग, ध्यान आदि से प्राप्त हुआ था।
हिरण्यकशिपु ऐसा ही पद चाहता था। योग, तपस्या तथा अन्य विधियों से प्राप्त सामान्य शक्तियाँ कभी-कभी नष्ट हो जाती हैं, लेकिन भगवान् की कृपा से प्राप्त होने वाली शक्तियाँ कभी नष्ट नहीं होतीं। अतएव हिरण्यकशिपु ऐसा वर चाहता था, जो कभी समाप्त न हो।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के सातवें स्कंध के अन्तर्गत “अमर बनने की हिरण्यकशिपु की योजना” नामक तीसरे अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥