श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 3: हिरण्यकशिपु की अमर बनने की योजना  »  श्लोक 6

 
श्लोक
तेन तप्ता दिवं त्यक्त्वा ब्रह्मलोकं ययु: सुरा: ।
धात्रे विज्ञापयामासुर्देवदेव जगत्पते ।
दैत्येन्द्रतपसा तप्ता दिवि स्थातुं न शक्नुम: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
तेन—उस (तपस्या की अग्नि) के द्वारा; तप्ता:—झुलसे; दिवम्—उच्च लोकों में अपने रिहायशी मकान; त्यक्त्वा—छोडक़र; ब्रह्म-लोकम्—ब्रह्मा के रहने वाले लोक को; ययु:—गये; सुरा:—देवतागण; धात्रे—इस ब्रह्माण्ड के प्रधान ब्रह्माजी तक; विज्ञापयाम् आसु:—निवेदन किया; देव-देव—हे देवताओं में प्रमुख; जगत्-पते—हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; दैत्य-इन्द्र-तपसा— दैत्यराज हिरण्यकशिपु द्वारा की जा रही कठोर तपस्या के द्वारा; तप्ता:—जले हुए; दिवि—स्वर्गलोक में; स्थातुम्—रुकने के लिए; न—नहीं; शक्नुम:—हम सब समर्थ हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हिरण्यकशिपु की कठोर तपस्या से झुलसने तथा अत्यन्त विचलित होने के कारण समस्त देवताओं ने अपने रहने के लोक छोड़ दिये और ब्रह्मा के लोक को गये जहाँ उन्होंने स्रष्टा को इस प्रकार सूचित किया—“हे देवताओं के स्वामी, हे ब्रह्माण्ड के प्रभु, हिरण्यकशिपु की कठोर तपस्या के कारण उसके शिर से निकलने वाली अग्नि के कारण हम लोग इतने उद्विग्न हैं कि हम अपने लोकों में रह नहीं सकते, अतएव हम आपके पास आये हैं।”
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥