श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
स इत्थं निर्जितककुबेकराड् विषयान् प्रियान् ।
यथोपजोषं भुञ्जानो नातृप्यदजितेन्द्रिय: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
स:—उसने (हिरण्यकशिपु); इत्थम्—इस प्रकार; निर्जित—जीत लीं; ककुप्—सारी दिशाएँ; एक-राट्—एकछत्र सम्राट; विषयान्—इन्द्रियविषयों को; प्रियान्—अत्यन्त प्रिय; यथा-उपजोषम्—यथासम्भव; भुञ्जान:—भोग करते हुए; न—नहीं; अतृप्यत्—सन्तुष्ट था; अजित-इन्द्रिय:—इन्द्रियों को वश में न कर सकने के कारण ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त दिशाओं को वश में करने की शक्ति प्राप्त करके तथा यथासम्भव सभी प्रकार की इन्द्रिय-तृप्ति का भोग करने के बावजूद हिरण्यकशिपु असन्तुष्ट रहा, क्योंकि वह अपनी इन्द्रियों को वश में करने के बजाय उनका दास बना रहा।
 
तात्पर्य
 यह आसुरी जीवन का एक उदाहरण है। भले ही नास्तिक लोग भौतिक दृष्टि से प्रगति कर लें और इन्द्रियों के लिए अत्यन्त सुखमय परिस्थिति उत्पन्न कर लें, किन्तु इन्द्रियों के वशीभूत होने के कारण वे कभी तुष्ट नहीं होते। यह आधुनिक सभ्यता का प्रभाव है। भौतिकतावादी व्यक्ति धन तथा स्त्रियों का भोग करने में बहुत आगे बढ़े रहते हैं फिर भी मानव समाज में असन्तोष व्याप्त रहता है, क्योंकि कृष्णभावनामृत के बिना मानव समाज कभी सुखी एवं शान्त नहीं रह सकता। जहाँ तक इन्द्रियतृप्ति का प्रश्न है, भौतिकतावादी अपने भोग को अपनी कल्पना भर बढ़ाते जा सकते हैं, किन्तु ऐसी भौतिक स्थिति में लोग अपनी इन्द्रियों के दास बने रहते हैं, अतएव वे तुष्ट नहीं रह सकते। हिरण्यकशिपु मानवता की इस असन्तुष्ट दशा का ज्वलन्त उदाहरण था।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥