श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।
प्रह्रादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
निर्वैराय—शत्रुहीन; प्रशान्ताय—अत्यन्त गम्भीर तथा शान्त; स्व-सुताय—अपने ही पुत्र को; महा-आत्मने—महान् भक्त; प्रह्रादाय—प्रह्लाद महाराज को; यदा—जब; द्रुह्येत्—सतायेगा; हनिष्ये—मैं मारूँगा; अपि—यद्यपि; वर-ऊर्जितम्—ब्रह्मा द्वारा वर प्राप्त ।.
 
अनुवाद
 
 जब हिरण्यकशिपु अपने ही पुत्र परम भक्त प्रह्लाद को सतायेगा, जो अत्यन्त शान्त, गम्भीर तथा शत्रुरहित है, तो मैं ब्रह्मा के समस्त वरों के होते हुए भी उसका तुरन्त ही वध कर दूँगा।
 
तात्पर्य
 समस्त पापों में सबसे घोर पाप है शुद्ध भक्त या वैष्णव के प्रति अपराध। एक वैष्णव के चरणकमलों पर किया गया अपराध इतना घातक होता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसकी तुलना उस प्रमत्त हाथी से की है, जो उद्यान में घुस कर अनेक पौधों तथा वृक्षों को उखाड़ कर अत्यन्त उपद्रव मचा देता है। यदि कोई किसी ब्राह्मण या वैष्णव के चरणकमलों के प्रति अपराधी है, तो उसके अपराध उसके समस्त पुण्यकर्मों का उच्छेद कर देते हैं। अतएव मनुष्य को सतर्क रहना चाहिए कि वैष्णव-अपराध न हो। यहाँ पर भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि यद्यपि हिरण्यकशिपु को ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त थे, किन्तु उसने ज्योंही अपने पुत्र प्रह्लाद महाराज के चरणकमलों पर अपराध किया कि उसके सारे वरदान व्यर्थ हो जाएंगे। यहाँ पर प्रह्लाद महाराज जैसे वैष्णव को निर्वैर अर्थात् शत्रुविहीन बतलाया गया है। श्रीमद्भागवत में अन्यत्र (३.२५.२१) कहा गया है कि अजातशत्रव: शान्ता: साधव: साधुभूषणा:—भक्त के कोई शत्रु नहीं होता, वह शान्त होता है, वह शास्त्रों के आदेशों का पालन करता है और उसके सभी व्यवहार शुद्ध होते हैं, वह शत्रुता मोल नहीं लेता, किन्तु यदि कोई उसका शत्रु बनता है, तो भगवान् उसका संहार कर देगें चाहे उसे कहीं से कितने ही वरदान क्यों न प्राप्त हों। निश्चय ही हिरण्यकशिपु अपनी तपस्या के फलों को भोग रहा था, किन्तु यहाँ पर भगवान् कहते हैं कि वह ज्योंही प्रह्लाद महाराज के चरणकमलों पर अपराध करेगा कि उसका विनाश कर दिया जाएगा। अपने पुण्यों के परिणामस्वरूप किसी की दीर्घायु, ऐश्वर्य, सौन्दर्य, शिक्षा तथा उसकी सम्पत्ति उसकी रक्षा नहीं कर सकते यदि वह वैष्णव के चरणकमलों पर अपराध करता है। सब कुछ होते हुए भी यदि कोई किसी वैष्णव के चरणकमलों पर अपराध करता है, तो वह विनष्ट हो जाएगा।
 
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