श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक  »  श्लोक 37

 
श्लोक
न्यस्तक्रीडनको बालो जडवत्तन्मनस्तया ।
कृष्णग्रहगृहीतात्मा न वेद जगदीद‍ृशम् ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
न्यस्त—त्याग करके; क्रीडनक:—सभी प्रकार के खेल-कूद या बचपन में खेल की प्रवृत्ति; बाल:—बालक; जड-वत्— आलसी की तरह बिना किसी गतिविधि के; तत्-मनस्तया—कृष्ण में पूर्णतया लीन होने से; कृष्ण-ग्रह—कृष्ण के द्वारा जो कि प्रबल प्रभाव के तुल्य (ग्रह के समान) हैं; गृहीत-आत्मा—जिसका मन पूर्णतया आकृष्ट है; न—नहीं; वेद—समझ पाया; जगत्—सम्पूर्ण भौतिक जगत; ईदृशम्—इस तरह का ।.
 
अनुवाद
 
 अपने बाल्यकाल के प्रारम्भ से ही प्रह्लाद महाराज को बालकों के खेल-कूद में अरुचि थी। निस्सन्देह, उन्होंने उन सबका परित्याग कर दिया था और कृष्णभावनामृत में पूर्णतया लीन होकर शान्त तथा जड़ बने रहते थे। चूँकि उनका मन सदैव कृष्णभावनामृत से प्रभावित रहता था, अतएव वे यह नहीं समझ सके कि यह संसार किस प्रकार से इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में निमग्न रहकर चलता रहता है।
 
तात्पर्य
 प्रह्लाद महाराज ऐसे व्यक्ति के ज्वलन्त उदाहरण हैं, जो कृष्णभावनामृत में पूर्णतया निमग्न रहता है। चैतन्य-चरितामृत (मध्य ८.२७४) में कहा गया है—
स्थावर-जंगम देखे, ना देखे तार मूर्ति।

सर्वत्र हय निज इष्ट-देव-स्फूर्ति ॥

पूर्णतया कृष्णभावनाभावित व्यक्ति इस जगत में स्थित होकर भी कृष्ण के अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं देखता। यह महाभागवत का लक्षण है। वह सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण देखता है क्योंकि कृष्ण के लिए उसमें शुद्ध प्रेम रहता है। जैसाकि ब्रह्म-संहिता द्वारा (५.३८) पुष्टि की गई हैं: प्रेमांजनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्त: सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति।

यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो उस भक्त द्वारा सदा देखे जाते हैं जिसकी आँखों में प्रेम का अंजन लगा हुआ है। वे भक्त के हृदय में स्थित अपने नित्य श्यामसुन्दर स्वरूप में देखे जाते हैं।” ऐसा दुर्लभ महात्मा पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होता है और वह अपने हृदय में भगवान् का निरन्तर दर्शन करता रहता है। कभी-कभी यह कहा जाता है कि यदि व्यक्ति पर शनि, राहु अथवा केतु जैसे बुरे ग्रहों का प्रभाव होता है, तो वह किसी भावी कार्य में उन्नति नहीं कर पाता। इसके ठीक विपरीत, प्रह्लाद महाराज कृष्ण रूपी परम ग्रह द्वारा प्रभावित थे। अतएव वे भौतिक जगत के विषय में न तो सोच सकते थे, न कृष्णभावनामृत के बिना जीवित रह सकते थे। यह महाभागवत का लक्षण है। भले ही कोई कृष्ण का शत्रु क्यों न हो, महाभागवत उसे भी कृष्ण की सेवा में संलग्न देखता है। एक अन्य मोटा उदाहरण यह है कि पीलियाग्रस्त आँखों को सब कुछ पीला दिखता है। इसी प्रकार महाभागवत को अपने अतिरिक्त हर व्यक्ति कृष्ण की सेवा में संलग्न प्रतीत होता है।

प्रह्लाद महाराज प्रमाणित महाभागवत अर्थात् परम भक्त हैं। पिछले श्लोक में बताया गया है कि उनमें नैसर्गिक अनुरक्ति थी (नैसर्गिकी रति:)। इस श्लोक में कृष्ण के प्रति ऐसी नैसर्गिक रति के लक्षण वर्णित हैं। यद्यपि प्रह्लाद महाराज अभी बच्चे थे किन्तु उन्हें खेलने में कोई रुचि न थी। जैसाकि श्रीमद्भागवत (११.२.४२) में कहा गया है विरक्तिरन्यत्र च—पूर्ण कृष्णभावनामृत का लक्षण है कि मनुष्य सारे भौतिक कार्यकलापों में कोई रुचि नहीं लेता। एक छोटे से बालक के लिए खेल-कूद छोड़ पाना असम्भव है, किन्तु प्रह्लाद महाराज उत्कृष्ट भक्ति में स्थित रहने के कारण सदैव कृष्णभावनामृत की समाधि में लीन रहते थे। जिस प्रकार एक भौतिकतावादी सदैव भौतिक लाभ के विचारों में खोया रहता है उसी तरह प्रह्लाद महाराज जैसा महाभागवत सदैव कृष्ण के विचारों में मग्न रहता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥