श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक  »  श्लोक 4

 
श्लोक
एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपु: ।
भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; लब्ध-वर:—वांछित वरदान पाकर; दैत्य:—हिरण्यकशिपु; बिभ्रत्—प्राप्त करके; हेम-मयम्—सोने की कान्ति वाला; वपु:—शरीर; भगवति—भगवान् विष्णु के प्रति; अकरोत्—निभाया; द्वेषम्—ईर्ष्या; भ्रातु: वधम्—अपने भाई के वध को; अनुस्मरन्—सदैव सोचते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार बह्मा जी से आशीष पाकर तथा कान्तियुक्त स्वर्णिम देह पाकर असुर हिरण्यकशिपु अपने भाई के वध का स्मरण करता रहा जिससे वह भगवान् विष्णु का ईर्ष्यालु बना रहा।
 
तात्पर्य
 आसुरी मनुष्य इस ब्रह्माण्ड में प्राप्त होने योग्य सारे ऐश्वर्यों
को प्राप्त करने के बाद भी भगवान् का ईर्ष्यालु बना रहता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥