श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड में हिरण्यकशिपु का आतंक  »  श्लोक 41

 
श्लोक
क्‍वचिदुत्पुलकस्तूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्वृत: ।
अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षण: ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
क्वचित्—कभी; उत्पुलक:—रोमांचित होकर; तूष्णीम्—पूर्णतया मौन; आस्ते—रहता है; संस्पर्श-निर्वृत:—भगवान् के सम्पर्क में अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव करते हुए; अस्पन्द—स्थिर; प्रणय-आनन्द—प्रेम सम्बन्ध के कारण दिव्य आनन्द से; सलिल—अश्रु भर कर; आमीलित—अधखुली; ईक्षण:—जिसकी आँखें ।.
 
अनुवाद
 
 कभी-कभी भगवान् के करकमलों का स्पर्श अनुभव करके वे आध्यात्मिक रूप से प्रसन्न होते और मौन बने रहते, उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते (रोमांच हो आता) और भगवान् के प्रेम के कारण उनके अर्धनिमीलित नेत्रों से अश्रु ढुलकने लगते।
 
तात्पर्य
 जब भक्त को भगवान् के वियोग का अनुभव होता है, तो वह उन्हें देखने के लिए आतुर हो उठता है और कभी-कभी जब उसे वियोग की पीड़ा सताती है, तो उसके अधखुले नेत्रों से अश्रुओं की झड़ी लग जाती है। जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक में
कहा है युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्। चक्षुषा प्रावृषायितम् का अर्थ है भक्त के नेत्रों से आँसुओं की निरन्तर झड़ी लग जाना। ये लक्षण, जो शुद्ध भक्तिमय आनन्द में प्रकट होते हैं, प्रह्लाद महाराज के शरीर में प्रकट हो रहे थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥