श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 11

 
श्लोक
श्रीप्रह्राद उवाच
पर: स्वश्चेत्यसद्ग्राह: पुंसां यन्मायया कृत: ।
विमोहितधियां द‍ृष्टस्तस्मै भगवते नम: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-प्रह्राद: उवाच—प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया; पर:—शत्रु; स्व:—स्वजन या मित्र; च—भी; इति—इस प्रकार; असत्- ग्राह:—जीवन की भौतिक धारणा; पुंसाम्—मनुष्यों की; यत्—जिसकी; मायया—माया से; कृत:—उत्पन्न; विमोहित—मोहग्रस्त; धियाम्—बुद्धिवालों का; दृष्ट:—साक्षात् अनुभव किया गया; तस्मै—उस; भगवते—भगवान् को; नम:—मेरा नमस्कार है ।.
 
अनुवाद
 
 प्रह्लाद महाराज ने उत्तर दिया: मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ जिनकी माया ने मनुष्यों की बुद्धि को चकमा देकर ‘मेरे मित्र’ तथा ‘मेरे शत्रु’ में अन्तर उत्पन्न किया है। निस्सन्देह, मुझको अब इसका वास्तविक अनुभव हो रहा है, यद्यपि मैंने पहले इसके विषय में प्रामाणिक स्रोतों से सुन रखा है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (५.१८) में कहा गया है—
विद्या विनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ॥

“विनीत साधु अपने असली ज्ञान के बल पर एक विद्वान तथा भद्र ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल (अछूत) को समान दृष्टि से देखता है।” जो पण्डित: हैं—अर्थात् जो वास्तव में विद्वान हैं, समदर्शी हैं, उन्नत भक्त जिन्हें प्रत्येक वस्तु का पूरा-पूरा ज्ञान है किसी भी प्राणी को मित्र या शत्रु के रूप में नहीं देखते। अपितु व्यापक दृष्टि होने से वे सबों को कृष्ण के अंश रूप में देखते हैं जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुष्टि की है (जीवेर ‘स्वरूप’ हय कृष्णेर ‘नित्य दास’)। प्रत्येक जीव भगवान् का अंश होने के कारण उनकी सेवा के लिए आया है, जिस तरह शरीर का प्रत्येक अंग पूरे शरीर की सेवा के लिए होता है।

सारे जीव भगवान् के दास के रूप में एक से हैं, लेकिन वैष्णव स्वाभाविक अपनी विनम्रता के कारण प्रत्येक अन्य जीव को प्रभु कहकर सम्बोधित करता है। वह अन्य दासों को इतना आगे बढ़ा देखता है कि उसे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इस तरह वह भगवान् के अन्य सभी भक्तों को प्रभु के रूप में स्वीकार करता है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति भगवान् का दास है, लेकिन अपनी विनम्रता के कारण वैष्णव दास दूसरे दास को अपना प्रभु (स्वामी) मानता है। प्रभु का ज्ञान गुरु के ज्ञान से प्रारम्भ होता है—

यस्य प्रसादाद् भगवत्प्रसादो यस्याप्रसादान् न गति: कुतोऽपि।

“गुरु की कृपा होने पर मनुष्य को कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गुरु की कृपा के बिना किसी भी तरह की प्रगति नहीं हो सकती।”

साक्षाद् धरित्वेन समस्तशास्त्रै रुक्तस्तथा भाव्यत एव सद्भि:।

किन्तु प्रभोर्य: प्रिय एव तस्य वन्दे गुरो: श्रीचरणारविन्दम् ॥

“गुरु का उतना ही आदर किया जाना चाहिए जितना कि भगवान् का किया जाता है क्योंकि वह भगवान् का परम विश्वस्त सेवक है। इसे समस्त शास्त्रों ने स्वीकार किया है और सारे विद्वान इसका पालन करते हैं। अतएव मैं ऐसे गुरु के चरणकमलों को सादर प्रणाम करता हूँ जो श्रीहरि (कृष्ण) के प्रामाणिक प्रतिनिधि हैं।” ईश्वर का दास गुरु भगवान् की अत्यन्त गुह्य सेवा में लगा रहता है। यह सेवा समस्त बद्धजीवों को माया के चंगुल से मुक्त करती है, जिसमें मनुष्य सोचता है “यह व्यक्ति मेरा शत्रु है और यह मेरा मित्र है।” वास्तव में भगवान् समस्त जीवों के मित्र हैं और सारे जीव भगवान् के नित्य दास हैं। एकत्व तो इसी ज्ञान से सम्भव है, न कि कृत्रिम विचार से कि हममें से प्रत्येक ईश्वर है या ईश्वर के तुल्य है। असली ज्ञान तो यही है कि ईश्वर परम प्रभु हैं और हम सभी उनके दास हैं, अतएव हम सभी एक ही स्तर (पद) पर हैं। प्रह्लाद महाराज को उनके गुरु नारद ने पहले ही यह सिखला दिया था, किन्तु तो भी प्रह्लाद को आश्चर्य हो रहा था कि किस तरह मोहग्रस्त जीव किसी को अपना मित्र और किसी को अपना शत्रु मानता है।

जब तक मनुष्य द्वैत दर्शन से चिपका रहता है और किसी को मित्र तथा किसी को शत्रु मानता है तब तक उसे माया के पाश में समझना चाहिए। मायावादी दार्शनिक भी भ्रम में रहता है, क्योंकि वह समस्त जीवों को ईश्वर मानकर उन्हें एक समझता है। कोई भी व्यक्ति ईश्वर के तुल्य नहीं है। दास कभी प्रभु (स्वामी) के तुल्य नहीं हो सकता। वैष्णव दर्शन के अनुसार स्वामी (प्रभु) एक है और दास भी एक हैं लेकिन स्वामी तथा दास में मुक्त अवस्था में भी अन्तर बना रहता है। बद्ध अवस्था में हम सोचते हैं कि कुछ प्राणी हमारे मित्र हैं और अन्य हमारे शत्रु हैं। इस तरह हम द्वैत भाव में बने रहते हैं। किन्तु मुक्त अवस्था में ईश्वर प्रभु के रूप में और सारे जीव ईश्वर के दास होने के कारण एक होते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥