श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 12

 
श्लोक
स यदानुव्रत: पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।
अन्य एष तथान्योऽहमिति भेदगतासती ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह भगवान्; यदा—जब; अनुव्रत:—अनुकूल या प्रसन्न; पुंसाम्—बद्धजीवों का; पशु-बुद्धि:—जीवन के विषय में पाशविक धारणा है (कि मैं भगवान् हूँ और हर एक ईश्वर है); विभिद्यते—नष्ट हो जाता है; अन्य:—दूसरा; एष:—यह; तथा— भी; अन्य:—दूसरा; अहम्—मैं; इति—इस प्रकार; भेद—अन्तर; गत—से युक्त; असती—संकटपूर्ण ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् किसी जीव से उसकी भक्ति के कारण प्रसन्न हो जाते हैं, तो वह पण्डित बन जाता है और वह शत्रु, मित्र तथा अपने में कोई भेद नहीं मानता। तब वह बुद्धिमानी से सोचता है कि हम सभी ईश्वर के नित्य दास हैं, अतएव हम एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं।
 
तात्पर्य
 जब प्रह्लाद महाराज के अध्यापकों तथा आसुरी पिता ने पूछा कि उसकी बुद्धि किस तरह दूषित हो गई है, तो प्रह्लाद महाराज ने कहा—“जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मेरी बुद्धि दूषित नहीं की गई है। परन्तु अपने गुरु की कृपा से तथा भगवान् कृष्ण की कृपा से मैंने अब यह सीखा है कि न तो कोई मेरा मित्र है और न कोई शत्रु है। वास्तव में हम सभी कृष्ण के नित्य दास हैं, किन्तु माया के प्रभाव से हम सोचते हैं कि हम एक दूसरे के शत्रु तथा मित्र रूप में भगवान् से भिन्न स्थित हैं। अब यह भ्रम दूर हो गया है, अतएव मैं सामान्य मनुष्यों की तरह नहीं रहा। अब मैं यह नहीं सोचता कि मैं ईश्वर हूँ और अन्य लोग मेरे शत्रु तथा मित्र हैं। अब मैं ठीक ही सोचता हूँ कि हर कोई ईश्वर का नित्य दास है और हमारा कर्तव्य है कि इन परम प्रभु की सेवा की जाये, क्योंकि तब हम दास के रूप में एकत्व के पद पर खड़े होंगे।”
असुरगण प्रत्येक व्यक्ति को मित्र या शत्रु मानते हैं, लेकिन वैष्णवों का कहना है कि चूँकि प्रत्येक व्यक्ति भगवान् का दास है, अतएव प्रत्येक व्यक्ति एक जैसे पद पर है। अत: एक वैष्णव अन्य जीवों को न तो शत्रु मानता है, न मित्र अपितु कृष्णभावनामृत का प्रसार करता है हर एक को यह शिक्षा देता है कि हम सभी भगवान् के दास के रूप में एक हैं, किन्तु हम राष्ट्रों, जातियों तथा शत्रु-मित्रों के वर्गों को जन्म देकर अपने अमूल्य जीवन व्यर्थ गँवा रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत पद प्राप्त करके भगवान् के दास रूप में एकत्व का अनुभव करना चाहिए। यद्यपि जीवन की चौरासी लाख योनियाँ हैं, किन्तु एक वैष्णव उनमें इस एकत्व का अनुभव करता है। ईशोपनिषद का उपदेश है— एकत्वम् अनुपश्यत:। भक्त को चाहिए कि भगवान् को प्रत्येक प्राणी के हृदय में स्थित देखे और यह भी देखे कि प्रत्येक जीव भगवान् के नित्य दास के रूप में है। यह दृष्टि एकत्वम् कहलाती है। यद्यपि दास तथा स्वामी का सम्बन्ध रहता है, किन्तु दास तथा स्वामी अपनी आध्यात्मिक पहचान के कारण एक हैं। यह भी एकत्वम् है। अतएव वैष्णव की एकत्वम् की धारणा मायावादी की धारणा से भिन्न है। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद महाराज से पूछा कि वह अपने परिवार से विपरीत क्यों हो गया है? जब किसी परिवार का कोई सदस्य किसी शत्रु द्वारा मारा जाता है, तो उस परिवार के सारे सदस्य उस हत्यारे के शत्रु बन जाते हैं, लेकिन हिरण्यकशिपु देख रहा था कि प्रह्लाद का तो हत्यारे से मैत्री-भाव था। अतएव उसने पूछा “किसने तुममें इस तरह की बुद्धि उत्पन्न की है? क्या तुमने स्वयं यह चेतना विकसित की है? चूँकि तुम छोटे से बालक हो, अतएव किसी ने अवश्य ही तुम्हें इस तरह सोचने के लिए प्रेरित किया है।” प्रह्लाद महाराज कहना चाहते थे कि विष्णु के अनुकूल मनोवृत्ति तभी विकसित हो सकती है जब भगवान् अनुकूल हों (स यदानुव्रत:)। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है—कृष्ण सबों के मित्र हैं (सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति )। भगवान् कभी भी लाखों जीवों में से किसी के भी शत्रु नहीं होते। वे तो सदा सबों के मित्र हैं। यही असली ज्ञान है। यदि कोई सोचता है कि भगवान् शत्रु हैं, तो उसकी बुद्धि पशुबुद्धि है। वह झूठ ही सोचता हैं “मैं अपने शत्रु से भिन्न हूँ और मेरा शत्रु मुझसे भिन्न है। चूँकि शत्रु ने ऐसा किया है अतएव मेरा कर्तव्य है कि मैं उसका वध करूँ।” इस भ्रान्त धारणा को इस श्लोक में भेदगतासती के रूप में वर्णित किया गया है। वास्तविक तथ्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान् का दास है जैसाकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने चैतन्य-चरितामृत में पुष्टि की है (जीवेर ‘स्वरूप’ हय—कृष्णेर ‘नित्यदास’)। ईश्वर के दास रूप में हम सभी एक हैं और शत्रुता और मित्रता का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि मनुष्य वास्तव में यह समझ ले कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति भगवान् का दास है, तो फिर शत्रु या मित्र का प्रश्न कहाँ उठता है? भगवान् की सेवा करने के लिए सबों को मैत्रीभाव रखना चाहिए। हर एक को चाहिए कि दूसरे द्वारा की गई भगवान् की सेवा की प्रशंसा करे और अपनी ही सेवा पर गर्वित न हो। यही वैष्णवों के सोचने की विधि या वैकुण्ठ विचार है। सेवा करने के लिए दासों में स्पर्द्धा हो सकती है, बाह्य रूप से होड़ लग सकती है, किन्तु वैकुण्ठ लोक में तो दूसरे दास की सेवा प्रशंसित होती है, निन्दित नहीं। यह वैकुण्ठ की स्पर्द्धा है। यहाँ पर दासों के मध्य शत्रुता का प्रश्न ही नहीं उठता। प्रत्येक व्यक्ति को पूरी सामर्थ्य भर भगवान् की सेवा करने देना चाहिए और हर एक को चाहिए कि दूसरे द्वारा की जाने वाली सेवा को समझे। वैकुण्ठ के कार्यकलाप ऐसे ही हैं। चूँकि हर व्यक्ति दास है अतएव हर एक समान स्तर (पद) पर होता है और उसे अपनी सामार्थ के अनुसार भगवान् की सेवा करने दी जाती है। जैसाकि भगवद्गीता से (१५.१५) पुष्ट होता है—सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—भगवान् सबों के हृदय में स्थित हैं और दास की मनोवृत्ति के अनुसार आदेश देते रहते हैं। किन्तु भगवान् भक्तों तथा अभक्तों को भिन्न-भिन्न आदेश देते हैं। अभक्तगण परमेश्वर की सत्ता को चुनौती देते हैं, अतएव भगवान् ऐसा आदेश देते हैं जिससे अभक्त जन्म-जन्मातर भगवान् की सेवा को भूलता रहता है और प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डित होता है। किन्तु जब भक्त अत्यन्त निष्ठापूर्वक भगवान् की सेवा करना चाहता है, तो भगवान् भिन्न रीति से आदेश देते हैं। जैसाकि भगवद्गीता (१०.१०) में भगवान् कहते हैं—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो निरन्तर मेरी भक्ति करते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं उन्हें मैं बुद्धि देता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।” प्रत्येक व्यक्ति वास्तव में दास है, वह न तो शत्रु है, न मित्र और हर व्यक्ति भगवान् के पृथक्-पृथक् आदेशानुसार कार्य कर रहा है, क्योंकि वे प्रत्येक जीव को उसकी मानसिकता के अनुसार निर्देश देते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥