श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 13

 
श्लोक
स एष आत्मा स्वपरेत्यबुद्धिभि-
र्दुरत्ययानुक्रमणो निरूप्यते ।
मुह्यन्ति यद्वर्त्मनि वेदवादिनो
ब्रह्मादयो ह्येष भिनत्ति मे मतिम् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; एष:—यह; आत्मा—प्रत्येक हृदय में स्थित परमात्मा; स्व-पर—यह मेरा कार्य है और वह दूसरे का है; इति—इस प्रकार; अबुद्धिभि:—ऐसी खराब बुद्धि वालों के द्वारा; दुरत्यय—पालन करना अत्यन्त दुष्कर; अनुक्रमण:—जिसकी भक्ति; निरूप्यते—निश्चित की जाती है (शास्त्रों या गुरु के उपदेशों से); मुह्यन्ति—मोहित हो जाते हैं; यत्—जिसके; वर्त्मनि—रास्ते में; वेद-वादिन:—वैदिक आदेशों के अनुयायी; ब्रह्म-आदय:—ब्रह्मा से लेकर देवगण तक; हि—निस्सन्देह; एष:—यह; भिनत्ति—बदल देती है; मे—मेरी; मतिम्—बुद्धि को ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग सदैव ‘शत्रु’ तथा ‘मित्र’ के बारे में सोचते हैं, वे अपने भीतर परमात्मा को स्थिर कर पाने में असमर्थ रहते हैं। इनकी जाने दें, ब्रह्मा जैसे बड़े-बड़े पुरुष जो वैदिक साहित्य से पूरी तरह अभिज्ञ हैं कभी-कभी भक्ति के सिद्धान्तों का पालन करते हुए मोहग्रस्त हो जाते हैं। जिस भगवान् ने यह परिस्थिति उत्पन्न की है उसी ने ही मुझे आपके तथाकथित शत्रु का पक्षधर बनने की बुद्धि दी है।
 
तात्पर्य
 प्रह्लाद महाराज ने खुल कर स्वीकार किया—“हे अध्यापको! आप त्रुटिवश सोचते हैं कि भगवान् विष्णु आपके शत्रु हैं, लेकिन चूँकि वे मुझ पर अनुकूल हैं, अतएव मैं
समझता हूँ कि वे सबों के मित्र हैं। आप भले ही यह सोचें कि मैंने आपके शत्रु का पक्ष ग्रहण किया है, लेकिन वास्तव में उन्होंने मुझ पर महान् कृपा की है।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥