श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 29

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
गुरुणैवं प्रतिप्रोक्तो भूय आहासुर: सुतम् ।
न चेद्गुरुमुखीयं ते कुतोऽभद्रासती मति: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; गुरुणा—अध्यापक द्वारा; एवम्—इस प्रकार; प्रतिप्रोक्त:—उत्तर दिये जाने पर; भूय:— पुन:; आह—कहा; असुर:—महान् दैत्य, हिरण्यकशिपु ने; सुतम्—अपने पुत्र को; न—नहीं; चेत्—यदि; गुरु-मुखी—गुरु के मुख से निकली; इयम्—यह; ते—तुम्हारा; कुत:—कहाँ से; अभद्र—हे अशुभ; असती—अत्यन्त बुरी; मति:—प्रवृत्ति, रुझान ।.
 
अनुवाद
 
 श्री नारद मुनि ने आगे कहा : जब हिरण्यकशिपु को अध्यापक से यह उत्तर मिल गया तो उसने पुन: अपने पुत्र को सम्बेधित किया। हिरण्यकशिपु ने कहा “रे धूर्त! हमारे परिवार के सबसे पतित! यदि तुमने यह शिक्षा अपने अध्यापकों से नहीं प्राप्त की, तो बतला कि इसे कहाँ से प्राप्त की?”
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवती ठाकुर बतलाते हैं कि भक्ति वास्तव में भद्रा सती होती है अभद्र असती नहीं होती। दूसरे शब्दों में, भक्ति का ज्ञान न तो अशुभ होता
है न शिष्टाचार के विरुद्ध होता है। भक्ति सीखना हर एक का कर्तव्य है। अतएव प्रह्लाद महाराज की तात्क्षणिक शिक्षा शुभ तथा पूर्ण सिद्ध होती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥