श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 31

 
श्लोक
न ते विदु: स्वार्थगतिं हि विष्णुं
दुराशया ये बहिरर्थमानिन: ।
अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना-
स्तेऽपीशतन्‍त्र्यामुरुदाम्नि बद्धा: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; ते—वे; विदु:—जानते हैं; स्व-अर्थ-गतिम्—जीवन का चरम लक्ष्य या अपने असली हित को; हि—निस्सन्देह; विष्णुम्—भगवान् विष्णु तथा उनके धाम को; दुराशया:—इस भौतिक जगत का भोग करने के इच्छुक; ये—जो; बहि:—बाह्य इन्द्रिय विषय; अर्थ-मानिन:—महत्त्वपूर्ण मानते हुए; अन्धा:—अन्धे व्यक्ति; यथा—जिस प्रकार; अन्धै:—दूसरे अन्धे व्यक्तियों द्वारा; उपनीयमाना:—ले जाए जाकर; ते—वे; अपि—यद्यपि; ईश-तन्त्र्याम्—भौतिक प्रकृति की रस्सियों (नियमों) को; उरु—अत्यन्त शक्तिशाली; दाम्नि—रस्सियाँ; बद्धा:—बँधी हुई ।.
 
अनुवाद
 
 जो लोग भौतिक जीवन के भोग की भावना द्वारा दृढ़ता से बँधे हैं और जिन्होंने अपने ही समान बाह्य इन्द्रिय विषयों से आसक्त अन्धे व्यक्ति को अपना नेता या गुरु स्वीकार कर रखा है, वे यह नहीं समझ सकते कि जीवन का लक्ष्य भगवद्धाम को वापस जाना तथा भगवान् विष्णु की सेवा में लगे रहना है। जिस प्रकार अन्धे व्यक्ति द्वारा ले जाया गया दूसरा अन्धा व्यक्ति सही मार्ग भूल सकता है और गड्ढे में गिर सकता है उसी प्रकार भौतिकता से आसक्त व्यक्ति अपने ही जैसे किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा मार्ग दिखलाये जाने पर सकाम कर्म की रस्सियों द्वारा बंधे रहते हैं, जो अत्यन्त मजबूत धागों से बनी होती हैं और ऐसे लोग तीनों प्रकार के कष्ट सहते हुए पुन:-पुन: भौतिक जीवन प्राप्त करते रहते हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि असुरों तथा भक्तों के विचारों में अन्तर होना ही चाहिए अतएव जब हिरण्यकशिपु की आलोचना उसके पुत्र प्रह्लाद महाराज द्वारा की जा रही थी तो उसे इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए था कि वे उसकी जीवन-शैली से सहमत न थे। तो भी हिरण्यकशिपु अत्यन्त क्रुद्ध था और अपने पुत्र को अध्यापक या गुरु का उपहास करने कि लिए डाँटना चाहता था, क्योंकि उसके अध्यापक महान् आचार्य शुक्राचार्य के ब्राह्मण-परिवार में उत्पन्न हुए थे। शुक्र शब्द का अर्थ हैं “वीर्य” और आचार्य गुरु का सूचक है। आदि काल से वंशानुगत गुरुओं को मान्यता प्राप्त होती रही है, किन्तु प्रह्लाद महाराज ने ऐसे जन्मजात गुरु को या उसके उपदेश को ग्रहण करने से इनकार कर दिया था। वास्तविक गुरु श्रोत्रिय होता है और जो परम्परा से पूर्ण ज्ञान सुनता है या प्राप्त किये होता है। अतएव प्रह्लाद महाराज ने जन्मजात गुरु को मान्यता नहीं दी। ऐसे गुरु विष्णु में तनिक भी रुचि नहीं
दिखाते। निस्सन्देह, वे भौतिक सफलता के इच्छुक रहते हैं (बहिरर्थमानिन: )। बहि: शब्द का अर्थ है “बाह्य,” अर्थ का “हित” तथा मानिन: का अर्थ “गम्भीरता से लेना” होता है। एक तरह से सभी लोग आध्यात्मिक जगत से अनजान हैं। भौतिकतावादियों का ज्ञान इस भौतिक जगत की ४०० करोड़ मील की सीमा तक संकुचित है, जो सृष्टि का अंधकारमय अंश है। वे यह नहीं जानते कि इस भौतिक जगत के परे आध्यात्मिक जगत भी है। जब तक कोई भगवान् का भक्त नहीं होता वह आध्यात्मिक जगत के अस्तित्व को नहीं समझ सकता। ऐसे गुरु जो इस भौतिक जगत में ही रुचि रखते हैं अन्धे कहे गये हैं। ऐसे अन्धे उन अनेक अन्धे अनुयायियों का मार्गदर्शन कर सकते हैं जिन्हें भौतिक दशाओं का सही ज्ञान नहीं है किन्तु ऐसे लोग प्रह्लाद महाराज जैसे भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं किये जाते। ऐसे अन्धे गुरु बाह्य भौतिक जगत में रुचि रखने के कारण सदैव प्रकृति की मजबूत रस्सियों द्वारा बँधे रहते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥