श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 4

 
श्लोक
एकदासुरराट् पुत्रमङ्कमारोप्य पाण्डव ।
पप्रच्छ कथ्यतां वत्स मन्यते साधु यद्भ‍वान् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
एकदा—एक बार; असुर-राट्—असुरों के सम्राट ने; पुत्रम्—अपने पुत्र को; अङ्कम्—गोद में; आरोप्य—लेकर; पाण्डव—हे महाराज युधिष्ठिर; पप्रच्छ—पूछा; कथ्यताम्—बतलाओ; वत्स—मेरे प्यारे पुत्र; मन्यते—मानते हो; साधु—श्रेष्ठतम; यत्—जिसे; भवान्—तुम ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा युधिष्ठिर, एक बार असुरराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बड़े ही दुलार से पूछा : हे पुत्र, मुझे यह बतलाओ कि तुमने अपने अध्यापकों से जितने विषय पढ़े हैं उनमें से सर्वश्रेष्ठ कौन सा है।
 
तात्पर्य
 हिरण्यकशिपु ने अपने कुमार बालक से ऐसी बात नहीं पूछी जिसका उत्तर दे पाना उसके लिए कठिन होता, अपितु उसने बालक को यह स्पष्ट बतलाने का अवसर दिया कि उसे सबसे अच्छा क्या लगता है। निस्सन्देह, प्रह्लाद महाराज परम भक्त होने के कारण सब कुछ जानते थे, अतएव वे बतला सकते थे कि जीवन का सर्वश्रेष्ठ अंश क्या है। वेदों में कहा गया है—यस्मिन् विज्ञाते सर्वमेवं विज्ञातं भवति—यदि कोई ईश्वर को ठीक से समझता है, तो वह किसी भी विषय को अच्छी तरह से समझ सकता है। कभी-कभी हमें बड़े-बड़े विज्ञानियों तथा दार्शनिकों को ललकारना पड़ता है, किन्तु कृष्ण की कृपा से हम विजयी होते हैं। एक तरह से देखा जाये तो सामान्य व्यक्ति के लिए यह असम्भव है कि वह असली ज्ञान के विषय में विज्ञानियों तथा दार्शनिकों को चुनौती दे पाये, किन्तु एक भक्त उन्हें ललकार सकता है, क्योंकि कृष्ण-कृपा से भक्त को प्रत्येक वस्तु का सर्वोत्कृष्ट ज्ञान होता है। जैसाकि भगवद्गीता (१०.११) में पुष्टि की गई है—
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम:।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

कृष्ण प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित होकर भक्त के हृदय के अज्ञान को दूर करते हैं। विशेष कृपा करके वे भक्त के समक्ष प्रकाश का दीपक दिखाकर उसे सारे ज्ञान से प्रकाशित करते हैं। अतएव प्रह्लाद महाराज श्रेष्ठ ज्ञान से अवगत थे और जब पिता ने पूछा तो उन्होंने उसे वह ज्ञान प्रदान किया। प्रह्लाद महाराज अपने बढ़े-चढ़े कृष्णभावनामृत के कारण कठिन से कठिन समस्या को हल करने में समर्थ थे। अतएव उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥