श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 41

 
श्लोक
परे ब्रह्मण्यनिर्देश्ये भगवत्यखिलात्मनि ।
युक्तात्मन्यफला आसन्नपुण्यस्येव सत्क्रिया: ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
परे—परम; ब्रह्मणि—ब्रह्म; अनिर्देश्ये—इन्द्रियों से अदृश्य; भगवति—भगवान् में; अखिल-आत्मनि—सबों के परमात्मा; युक्त- आत्मनि—जिसका मन लगा था, उस (प्रह्लाद) पर; अफला:—निष्फल, व्यर्थ; आसन्—थे; अपुण्यस्य—ऐसे व्यक्ति का जिसके पास पुण्यकर्मों की पूँजी न हो; इव—सदृश; सत्-क्रिया:—सत्कर्म (यथा यज्ञ तथा तपस्या) ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा व्यक्ति जिसके पास कोई पुण्यकर्म की कमाई नहीं होती यदि वह कोई अच्छा कार्य करे भी तो उसका कोई परिणाम नहीं निकलता। इसी प्रकार राक्षसों के हथियारों का प्रह्लाद महाराज पर कोई प्रकट प्रभाव नहीं पड़ रहा था, क्योंकि वे भौतिक दशाओं से अविचलित रहने वाले भक्त थे और उन भगवान् का ध्यान करने तथा सेवा करने में व्यस्त थे, जो अनश्वर थे, जिन्हें भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के आत्मा हैं।
 
तात्पर्य
 प्रह्लाद महाराज भगवान् के विचार में निरन्तर पूर्णतया मग्न रहते थे। जैसाकि कहा गया है गोविन्द परिरम्भित:। प्रह्लाद महाराज सदैव ध्यान में लीन रहते थे, अतएव उनकी रक्षा गोविन्द करते थे। जिस प्रकार एक छोटा सा शिशु अपने पिता या माता की गोद में पूर्णत: सुरक्षित रहता है वैसे ही भक्त समस्त परिस्थितियों में परमेश्वर द्वारा सुरक्षित रहता है। तो क्या इसका अर्थ यह होता है कि जब राक्षसों ने प्रह्लाद महाराज पर आक्रमण किया तो गोविन्द पर भी उनका प्रहार हुआ? ऐसा सम्भव नहीं है। असुरों ने भगवान् को चोट पहुँचाने या मार डालने के अनेक प्रयास किये, किन्तु वे किसी भौतिक साधन द्वारा क्षतिग्रस्त नहीं हो सकते, क्योंकि वे सदैव अध्यात्म में लीन रहते
हैं। अतएव यहाँ पर परे ब्रह्मणि शब्दों का प्रयोग हुआ है। राक्षसगण न तो परमेश्वर को देख सकते हैं, न उन्हें छू सकते हैं, यद्यपि वे ऊपरी तौर पर यह सोचे कि वे भगवान् के दिव्य शरीर पर अपने भौतिक हथियारों से प्रहार कर रहे हैं। इस श्लोक में भगवान् को अनिर्देश्ये कहा गया है। चूँकि वे सर्वव्यापी हैं, अतएव हम उन्हें किसी एक स्थान पर नहीं देख सकते। साथ ही, वे अखिलात्मा हैं, वे हर वस्तु के प्राण हैं, यहाँ तक कि भौतिक हथियारों के भी। जो लोग भगवान् की स्थिति को नहीं समझते वे हतभाग्य हैं। भले ही वे यह सोचें कि वे भगवान् तथा उसके भक्त को मार सकते हैं, किन्तु उनके सारे प्रयास व्यर्थ जाते हैं। भगवान् जानते हैं कि उनसे किस प्रकार निपटा जाए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥