श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 46

 
श्लोक
वर्तमानोऽविदूरे वै बालोऽप्यजडधीरयम् ।
न विस्मरति मेऽनार्यं शुन: शेप इव प्रभु: ॥ ४६ ॥
 
शब्दार्थ
वर्तमान:—स्थित होकर; अविदूरे—अधिक दूरी पर नहीं; वै—निस्सन्देह; बाल:—शिशु मात्र; अपि—यद्यपि; अजड-धी:— पूर्ण निर्भीक; अयम्—यह; न—नहीं; विस्मरति—भूलता है; मे—मेरा; अनार्यम्—दुर्व्यवहार; शुन: शेप:—कुत्ते की टेढ़ी पूँछ; इव—सदृश; प्रभु:—समर्थ होकर ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि यह मेरे अत्यन्त निकट है और निरा बालक है फिर भी यह पूर्ण निर्भीक है। यह उस कुत्ते की टेढ़ी पूँछ के समान है, जो कभी सीधी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह मेरे दुर्व्यवहार तथा अपने स्वामी भगवान् विष्णु से अपने सम्बन्ध को कभी भी नहीं भूलता है।
 
तात्पर्य
 शुन: शब्द का अर्थ है “कुत्ते की” और शेप का अर्थ है “पूँछ”। यह उदाहरण अत्यन्त सीधा सा है। कोई कुत्ते की पूँछ को सीधा करने का कितना ही प्रयास क्यों न करे वह कभी भी सीधी नहीं होती अपितु सदैव टेढ़ी ही रहती
है। शुन: शेप अजीगर्त के द्वितीय पुत्र का नाम भी है। उसे हरिश्चन्द्र को भी बेच दिया गया था, लेकिन बाद में उसने विश्वामित्र की शरण ले ली थी जो हरिश्चन्द्र का शत्रु था और फिर उसका साथ नहीं छोड़ा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥