श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 51

 
श्लोक
तथेति गुरुपुत्रोक्तमनुज्ञायेदमब्रवीत् ।
धर्मो ह्यस्योपदेष्टव्यो राज्ञां यो गृहमेधिनाम् ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—इस प्रकार से; इति—इस तरह; गुरु-पुत्र-उक्तम्—शुक्राचार्य के पुत्रों, षण्ड तथा अमर्क द्वारा सलाह दिये जाने पर; अनुज्ञाय—मानकर; इदम्—यह; अब्रवीत्—कहा; धर्म:—कर्तव्य; हि—निस्सन्देह; अस्य—प्रह्लाद को; उपदेष्टव्य:—उपदेश देना चाहिए; राज्ञाम्—राजाओं के; य:—जो; गृह-मेधिनाम्—गृहस्थ जीवन में जिनकी रुचि है ।.
 
अनुवाद
 
 अपने गुरु पुत्र षण्ड तथा अमर्क के इन उपदेशों को सुनकर हिरण्यकशिपु राजी हो गया और उनसे प्रह्लाद को इस वृत्तिपरक धर्म का उपदेश देने की प्रार्थना की जिसका पालन राजसी गृहस्थ परिवार करते हैं।
 
तात्पर्य
 हिरण्यकशिपु चाहता था कि प्रह्लाद महाराज देश या विश्व का शासन चलाने के लिए कूटनीतिक राजा के रूप में प्रशिक्षित हो न कि संन्यास आश्रम के लिए उपदेश प्राप्त करे। धर्म शब्द किसी धार्मिक विश्वास के लिए नहीं प्रयुक्त हुआ। जैसाकि स्पष्ट कहा गया है—धर्मो ह्यस्योपदेष्टव्यो राज्ञां यो गृहमेधिनाम्। राजाओं के परिवार दो प्रकार के होते हैं—पहले वे जिसके सदस्य गृहस्थ जीवन से आसक्त रहते हैं और दूसरे राजर्षि अर्थात् वे राजा जो शासक के रूप में शासन करते हैं, किन्तु साथ ही ऋषि भी होते हैं। प्रह्लाद राजर्षि बनना चाहते थे, किन्तु हिरण्यकशिपु उसे इन्द्रिय-भोग-आसक्त राजा बनाना चाहता था (गृहमेधिनाम् )। इसीलिए आर्य प्रणाली में वर्णाश्रम धर्म होता है, जिसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपने वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) तथा आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास) के अनुसार शिक्षा प्राप्त करता है।
भक्ति से पवित्र हुआ भक्त संसारी गुणों से ऊपर दिव्य स्थिति में रहता है। इस प्रकार प्रह्लाद महाराज तथा हिरण्यकशिपु में यह अन्तर था कि हिरण्यकशिपु चाहता था कि प्रह्लाद संसार में लिप्त रहे, किन्तु प्रह्लाद तो प्रकृति के गुणों से ऊपर थे। जब तक कोई प्रकृति के वश में रहता है तब तक उसका वृत्तिपरक कर्तव्य (धर्म) उस व्यक्ति से भिन्न होता है, जो प्रकृति के वश में नहीं होता। मनुष्य के असली धर्म का वर्णन श्रीमद्भागवत में हुआ है (धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम् )। जैसाकि धर्मराज या यमराज ने अपने आदेशपालक से कहा था, जीव आध्यात्मिक सत्ता है अतएव उसका वृत्तिपरक कर्तव्य धर्म भी आध्यात्मिक है। वास्तविक धर्म तो वह है, जिसका उपदेश भगवद्गीता में हुआ है— सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। मनुष्य को चाहिए कि वह भौतिक धर्म का परित्याग उसी तरह कर दे जिस प्रकार उसे भौतिक शरीर का परित्याग करना होता है। चाहे किसी का धर्म हो, यहाँ तक कि वर्णाश्रम धर्म के अनुसार भी हो, उसे उसका परित्याग करके अपने आध्यात्मिक कार्य में लग जाना चाहिए। मनुष्य के असली धर्म का वर्णन श्री चैतन्य महाप्रभु ने किया है—जीवेर ‘स्वरूप’ हय—कृष्णेर ‘नित्य दास’—प्रत्येक व्यक्ति कृष्ण का नित्य दास है। यही मनुष्य का असली धर्म है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥