श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 6

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
श्रुत्वा पुत्रगिरो दैत्य: परपक्षसमाहिता: ।
जहास बुद्धिर्बालानां भिद्यते परबुद्धिभि: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—नारद मुनि ने कहा; श्रुत्वा—सुनकर; पुत्र-गिर:—अपने पुत्र की उपदेशमयी वाणी; दैत्य:—हिरण्यकशिपु; पर-पक्ष—शत्रु की ओर; समाहिता:—श्रद्धा युक्त; जहास—हँसा; बुद्धि:—बुद्धि; बालानाम्—छोटे बालकों की; भिद्यते— प्रदूषित होती है; पर-बुद्धिभि:—शत्रु पक्ष के सिखलाने से ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : जब प्रह्लाद महाराज ने भक्तिमय आत्म-साक्षात्कार के विषय में बतलाया और इस तरह अपने पिता के शत्रु-पक्ष के प्रति अपनी स्वामि-भक्ति दिखलाई तो असुरराज हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद की बातें सुनकर हँसते हुए कहा—“शत्रु की वाणी द्वारा बाल बुद्धि इसी तरह बिगाड़ी जाती है।”
 
तात्पर्य
 हिरण्यकशिपु असुर होने के कारण विष्णु तथा उनके भक्तों को अपना शत्रु मानता था। इसलिए यहाँ पर परपक्ष (शत्रु की ओर) शब्द व्यवहृत हुआ है। हिरण्यकशिपु ने कभी भी विष्णु या कृष्ण की बातें नहीं मानीं। प्रत्युत वह किसी भी वैष्णव की बुद्धि से क्रुद्ध हो जाता था। भगवान् विष्णु या कृष्ण कहते हैं—सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—अन्य सारे कर्तव्यों को त्याग कर मेरी शरण में आओ। किन्तु हिरण्यकशिपु जैसे असुरों ने इससे कभी सहमति नहीं दिखलाई। अतएव कृष्ण कहते हैं—
न मां दुष्कुतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: ॥

“जो शैतान नितान्त मूर्ख हैं, जो मनुष्यों में अधम हैं, जिनकी बुद्धि मोह द्वारा नष्ट हो चुकी है और जो असुर भाव में हिस्सा बँटाते हैं, वे मेरी शरण में नहीं आते” (भगवद्गीता ७.१५)। असुरभाव हिरण्यकशिपु का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे लोग मूढ तथा नराधम होने के कारण कभी भी विष्णु को ब्रह्म रूप में स्वीकार नहीं करते और न उनकी शरण ग्रहण करते हैं। स्वाभाविक था कि हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद पर अत्यधिक क्रुद्ध होता, क्योंकि वह शत्रुपक्ष द्वारा प्रभावित हो रहा था। अतएव उसने आदेश दिया था कि उसके पुत्र के निवास स्थान में नारद जैसे साधु पुरुषों को प्रविष्ट न होने दिया जाये, अन्यथा वैष्णव उपदेशों से प्रह्लाद अधिक बिगड़ जाएगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥