श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 5: हिरण्यकशिपु का साधु पुत्र प्रह्लाद महाराज  »  श्लोक 7

 
श्लोक
सम्यग्विधार्यतां बालो गुरुगेहे द्विजातिभि: ।
विष्णुपक्षै: प्रतिच्छन्नैर्न भिद्येतास्य धीर्यथा ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
सम्यक्—पूर्णतया; विधार्यताम्—उसकी सुरक्षा की जाये; बाल:—यह कम आयु का; गुरु-गेहे—गुरुकुल में, जहाँ बच्चों को गुरु द्वारा पढ़ाये जाने के लिए भेज दिया जाता है; द्वि-जातिभि:—ब्राह्मणों द्वारा; विष्णु-पक्षै:—विष्णु की ओर के; प्रतिच्छन्नै:—छद्म वेश में रहने वाले; न भिद्येत—प्रभावित न होने पाए; अस्य—उसकी; धी:—बुद्धि; यथा—जिससे ।.
 
अनुवाद
 
 हिरण्यकशिपु ने अपने सहायकों को आदेश दिया: हे असुरो, इस बालक के गुरुकुल में जहाँ पर यह शिक्षा पाता है, इसकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखो जिससे इसकी बुद्धि छद्मवेश में घूमने वाले वैष्णवों द्वारा और अधिक न प्रभावित हो पाए।
 
तात्पर्य
 हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन में मनुष्य को सामान्य कर्मी की भाँति वेश धारण करने की कला का ज्ञान आवश्यक है, क्योंकि आसुरी साम्राज्य में प्रत्येक व्यक्ति वैष्णव उपदेशों के विरुद्ध रहता है। कृष्णभावनामृत वर्तमान युग के असुरों को तनिक भी नहीं भाता। ज्योंही वे किसी को केसरिया वस्त्र धारण किये, गले में माला डाले तथा मस्तक पर तिलक लगाये देखते हैं कि वे तुरन्त ही क्षुब्ध हो उठते हैं। वे वैष्णवों का उपहास करने के लिए हरे कृष्ण कहकर उनकी आलोचना करते हैं और कुछ लोग तो निष्ठा से हरे कृष्ण का जाप भी करते हैं। प्रत्येक अवस्था में चूँकि हरे कृष्ण परम है, चाहे कोई मजाक में कहे या निष्ठापूर्वक कहे फिर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। वैष्णवगण जो प्रसन्न होते हैं जब असुरगण हरे कृष्ण कीर्तन करते हैं, क्योंकि इससे पता चलता है कि हरे कृष्ण आन्दोलन की जड़ें गहरा
रही हैं। वैष्णवों को दण्डित करने के लिए हिरण्यकशिपु जैसे बड़े-बड़े असुर सदैव तत्पर रहते हैं और ऐसी व्यवस्था करते हैं जिससे वैष्णव लोग न तो अपनी पुस्तकें बेचने, न ही कृष्णभावनामृत का प्रचार करने आएं। इस प्रकार हिरण्यकशिपु ने जो कुछ बहुत समय पहले किया था, वही आज भी हो रहा है। यही भौतिकतावादी जीवन-शैली है। असुर या भौतिकतावादी नहीं चाहते कि कृष्णभावनामृत किसी प्रकार उन्नति करे और वे इसमें नाना प्रकार से विघ्न डालने का प्रयास करते रहते हैं। इतने पर भी कृष्णभावनामृत के प्रचारकों को अपना वैष्णव वेश बना कर या अन्य वेश में उपदेश देने के लिए आगे बढ़ते जाना चाहिए। चाणक्य पंडित का कहना है कि यदि ईमानदार व्यक्ति को किसी बहुत बड़े ठग से पाला पड़े तो यह आवश्यक है कि वह भी ठग बने—ठगने के उद्देश्य से नहीं अपितु अपने उपदेश कार्य को सफल बनाने के लिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥