श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 19

 
श्लोक
न ह्यच्युतं प्रीणयतो बह्वायासोऽसुरात्मजा: ।
आत्मत्वात्सर्वभूतानां सिद्धत्वादिह सर्वत: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; हि—निस्सन्देह; अच्युतम्—कभी न गिरने वाले भगवान्; प्रीणयत:—तुष्ट करते हुए; बहु—अत्यधिक; आयास:— प्रयास; असुर-आत्म-जा:—हे असुरपुत्रों; आत्मत्वात्—सिद्ध होने के कारण; सर्व-भूतानाम्—सारेजीवों का; सिद्धत्वात्— स्थापित होने से; इह—इस संसार में; सर्वत:—सभी दिशाओं में, सभी कालों में तथा सभी दृष्टिकोणों से ।.
 
अनुवाद
 
 हे दैत्यपुत्रो, भगवान् नारायण ही समस्त जीवों के पिता और मूल परमात्मा हैं। फलस्वरूप उन्हें प्रसन्न करने में या किसी भी दशा में उनकी पूजा करने में बच्चे या वृद्ध को कोई अवरोध नहीं होता। जीव तथा भगवान् का अन्त:सम्बन्ध एक तथ्य है अतएव भगवान् को प्रसन्न करने में कोई कठिनाई नहीं है।
 
तात्पर्य
 कोई यह पूछ सकता है “यह ठीक है कि मनुष्य पारिवारिक जीवन के प्रति अत्यन्त आसक्त रहता है, किन्तु यदि उसे यह जीवन छोडक़र भगवान् की सेवा में आसक्त होना है, तो उसे उतना ही प्रयास करना तथा कष्ट झेलना होगा। अतएव इस तरह कष्ट झेलकर भगवान् की सेवा में लगने से क्या लाभ?” यह वैध आपत्ति नहीं है। भगवान् भगवद्गीता (१४.४) में बल देकर कहते हैं—
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।

तासां ब्रह्म महद् योनिरहं बीजप्रद: पिता ॥

“हे कुन्तीपुत्र! यह जान लो कि इस भौतिक प्रकृति में सारी जीवयोनियाँ जन्म द्वारा सम्भव होती हैं और मैं वीर्यदाता पिता हूँ।” भगवान् नारायण सभी जीवों के वीर्यदाता पिता हैं, क्योंकि सारे जीव परमेश्वर के अंश हैं (ममैवांशो...जीव भूत:)। जिस प्रकार पिता तथा पुत्र के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं होती उसी प्रकार नारायण तथा जीवों के मध्य प्राकृतिक घनिष्ठ सम्बन्ध को पुन:स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं है। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्—

यदि कोई रंचमात्र भी भक्ति करता है, तो नारायण उसे बड़े से बड़े खतरे से बचाने के लिए सदैव सन्नद्ध रहते हैं। इसका सर्वविदित उदाहरण अजामिल है। अजामिल ने अनेक पापकर्म करके अपने को भगवान् से विलग कर लिया था और यमराज ने उसे अत्यन्त कठोर दण्ड देकर नीचा दिखाना चाहा, लेकिन उसने मृत्यु के समय नारायण का नामोच्चार किया था, जो भगवान् नारायण का उच्चार न होकर उसके पुत्र नारायण का उच्चार था तो भी वह यमराज के हाथों से बचा लिया गया। इसलिए नारायण को प्रसन्न करने में उतना प्रयत्न नहीं करना पड़ता जितना कि अपने परिवार को, जाति तथा राष्ट्र को प्रसन्न करने में। हमने देखा है कि नामी से नामी राजनीतिक नेता अपने आचरण में थोड़ी सी भी गड़बड़ी के लिए जान से मारे गये हैं। अतएव अपने समाज, परिवार, जाति तथा राष्ट्र को प्रसन्न कर पाना, अत्यन्त कठिन है, किन्तु नारायण को प्रसन्न कर पाना तनिक भी कठिन नहीं, यह अत्यन्त सरल काम है।

मनुष्य का कर्तव्य है कि वह नारायण के साथ अपने सम्बन्ध को पुन: जागृत करे। इस दिशा में थोड़ा प्रयास करने से सफलता प्राप्त होगी जबकि अपने तथाकथित परिवार, समाज तथा राष्ट्र को अपने जीवन का बलिदान देकर भी प्रसन्न कर पाना सम्भव नहीं होगा। भगवान् के पवित्र नाम के श्रवण तथा कीर्तन—श्रवणं कीर्तनं विष्णो:—में निहित थोड़ा प्रयास भगवान् को प्रसन्न करने में सफल बना सकता है, अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपना आशीर्वाद—परं विजयते श्रीकृष्ण सङ्कीर्तनम्—श्रीकृष्ण संकीर्तन की जय हो कहकर दिया। यदि कोई मनुष्य जीवन का असली लाभ उठाना चाहता है, तो उसे भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥