श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 20-23

 
श्लोक
परावरेषु भूतेषु ब्रह्मान्तस्थावरादिषु ।
भौतिकेषु विकारेषु भूतेष्वथ महत्सु च ॥ २० ॥
गुणेषु गुणसाम्ये च गुणव्यतिकरे तथा ।
एक एव परो ह्यात्मा भगवानीश्वरोऽव्यय: ॥ २१ ॥
प्रत्यगात्मस्वरूपेण द‍ृश्यरूपेण च स्वयम् ।
व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योऽविकल्पित: ॥ २२ ॥
केवलानुभवानन्दस्वरूप: परमेश्वर: ।
माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
पर-अवरेषु—जीवन की श्रेष्ठ या नारकीय स्थिति में; भूतेषु—जीवों में; ब्रह्म-अन्त—ब्रह्मा में समाप्त होने वाले; स्थावर- आदिषु—पेड़-पौधों जैसे अचल प्राणियों से लेकर; भौतिकेषु—भौतिक तत्त्वों में; विकारेषु—रूपान्तरों में; भूतेषु—प्रकृति के पाँच स्थूल तत्त्वों में; अथ—साथ ही; महत्सु—महत् तत्त्व में पूर्ण शक्ति; च—भी; गुणेषु—प्रकृति के गुणों से; गुण-साम्ये— भौतिक गुणों के संतुलन में; च—तथा; गुण-व्यतिकरे—प्रकृति के नियमों के असमान प्राकट्य में; तथा—और; एक:—एक; एव—एकमात्र; पर:—दिव्य; हि—निस्सन्देह; आत्मा—मूल स्रोत; भगवान्—भगवान्; ईश्वर:—नियन्ता; अव्यय:— विकाररहित; प्रत्यक्—आन्तरिक; आत्म-स्वरूपेण—परमात्मा के रूप में, अपने मूल स्वाभाविक पद के द्वारा; दृश्य-रूपेण— अपने दृश्य रूपों द्वारा; च—भी; स्वयम्—स्वयं; व्याप्य—व्याप्त; व्यापक—सर्वव्यापी; निर्देश्य:—वर्णन किया जाने वाला; हि—निश्चय; अनिर्देश्य:—जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता (सूक्ष्म उपस्थिति के कारण); अविकल्पित:—बिना भेदभाव के; केवल—एकमात्र; अनुभव-आनन्द-स्वरूप:—जिसका स्वरूप आनन्द पूर्ण तथा ज्ञान से युक्त है; परम-ईश्वर:—परमेश्वर, परम शासक; मायया—माया द्वारा; अन्तर्हित—आवृत, ढका हुआ; ऐश्वर्य:—जिसका असीम ऐश्वर्य; ईयते—भूल से मान लिया जाता है; गुण-सर्गया—प्रकृति के गुणों की अन्योन्य क्रिया से ।.
 
अनुवाद
 
 परम नियन्ता भगवान् जो अच्युत तथा अजेय हैं जीवन के विभिन्न रूपों में यथा पौधे जैसे स्थावर जीवों से लेकर प्रथम जन्मे प्राणी ब्रह्मा तक में उपस्थित हैं। वे अनेक प्रकार की भौतिक सृष्टियों में भी उपस्थित हैं तथा सारे भौतिक तत्त्वों, सम्पूर्ण भौतिक शक्ति एवं प्रकृति के तीनों गुणों (सतो, रजो तथा तमो गुण) के साथ-साथ अव्यक्त प्रकृति एवं मिथ्या अंहकार में भी उपस्थित हैं। एक होकर भी वे सर्वत्र उपस्थित रहते हैं। वे समस्त कारणों के कारण दिव्य परमात्मा भी हैं, जो सारे जीवों के अन्तस्तल में प्रेक्षक के रूप में उपस्थित हैं। उन्हें व्याप्य तथा सर्वव्यापक परमात्मा के रूप में इंगित किया गया है, लेकिन वास्तव में उनको इंगित नहीं किया जा सकता। वे अपरिवर्तित तथा अविभाज्य हैं। वे परम सच्चिदानन्द के रूप में अनुभव किये जाते हैं। माया के आवरण से ढके होने के कारण नास्तिक को वे अविद्यमान प्रतीत होते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् न केवल समस्त जीवों के परमात्मा के रूप में उपस्थित हैं, अपितु एकसाथ वे सारी सृष्टि में प्रत्येक वस्तु में व्याप्त हैं। वे समस्त परिस्थितियों में और सभी समय विद्यमान रहते हैं। वे ब्रह्माजी के हृदय में विद्यमान रहते हैं और कूकरों, शूकरों, वृक्षों, पौधों इत्यादि के भी अन्तस्तल में रहते हैं। वे सर्वत्र उपस्थित हैं। वे न केवल जीवों के हृदय में उपस्थित हैं अपितु भौतिक वस्तुओं में, यहाँ तक कि भौतिकविज्ञानियों द्वारा खोजे गये परमाणुओं, प्रोटाँनों तथा इलेक्ट्रानों में भी रहते हैं।
भगवान् तीन रूपों में उपस्थित रहते हैं—ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्। चूँकि वे सर्वत्र विद्यमान हैं, अतएव उन्हें सर्वं खल्विदं ब्रह्म—ब्रह्म से परे विद्यमान कहा गया है। भगवद्गीता से पुष्टि होती है कि अपने ब्रह्म रूप के द्वारा कृष्ण सर्वव्याप्त हैं (मया ततम् इदं सर्वम् ) लेकिन ब्रह्म कृष्ण पर आश्रित है (ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम् )। कृष्ण के बिना ब्रह्म या परमात्मा का अस्तित्व नहीं हो सकता। अतएव भगवान् परम सत्य की चरम अनूभूति हैं। यद्यपि वे प्रत्येक हृदय के भीतर परमात्मा रूप में स्थित हैं फिर भी वे एक हैं चाहे वह व्यक्तिगत रूप में हों या सर्वव्यापी ब्रह्म के रूप में। कृष्ण परम कारणस्वरूप हैं और जिन भक्तों ने भगवान् की शरण ग्रहण की है वे उनकी तथा उनकी उपस्थिति का अनुभव ब्रह्माण्ड में तथा प्रत्येक परमाणु में कर सकते हैं (अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थम् )। यह अनुभूति केवल उन भक्तों को होती है जिन्होंने भगवान् के चरणकमलों पर अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है। अन्यों के द्वारा यह सम्भव नहीं। इसकी पुष्टि स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (७.१४) में की है—

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

सौभाग्यशाली जीव ही भक्तिमयी प्रवृत्ति में शरणागति की विधि को स्वीकार करते हैं। अनेक लोकों में विविध योनियों में चक्कर लगाने के बाद जब मनुष्य को भक्त की कृपा से परम सत्य का असली ज्ञान होता है, तो वह भगवान् की शरण ग्रहण करता है, जैसाकि भगवद्गीता में पुष्ट हुआ है (बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते )।

दैत्यकुलों में उत्पन्न प्रह्लाद महाराज के सहपाठियों ने सोचा कि ब्रह्म की अनुभूति कर पाना अत्यन्त कठिन होगा। निस्सन्देह, अनेक लोग यही बात कहते हैं, इसका हमें अनुभव है। किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। ब्रह्म समस्त जीवों से घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित हैं। अतएव यदि कोई वैष्णव दर्शन को समझता है, जो यह बतलाता है कि ब्रह्म किस तरह सर्वत्र उपस्थित है और वह किस प्रकार सर्वत्र कर्म करता है, तो उसके लिए भगवान् की पूजा करना या उनकी अनुभूति करना तनिक भी कठिन नहीं है। फिर भी भगवान् की अनुभूति भक्तों की संगति से ही सम्भव है। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी को शिक्षा देते हुए कहा (चैतन्य चरितामृत, मध्य १९.१५१)—

ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव।

गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज ॥

भौतिक दशा में जीव अनेक योनियों में तथा अनेक परिस्थितियों में घूमता रहता है, किन्तु यदि वह शुद्ध भक्त के सम्पर्क में आता है और भक्ति के विषय में उससे शिक्षाएँ ग्रहण करने की बुद्धिमानी दिखाता है, तो वह ब्रह्म तथा परमात्मा के उत्स भगवान् को बिना कठिनाई के समझ सकता है। इस सम्बन्ध में श्रील मध्वाचार्य कहते हैं—

अन्तर्यामी प्रत्यगात्मा व्याप्त: कालो हरि: स्मृत:।

प्रकृत्या तमसावृतत्वात् हरेरैश्वर्यं न ज्ञायते ॥

भगवान् हरेक के हृदय में अन्तर्यामी रूप में उपस्थित हैं और शरीर से आवृत आत्मा में दृश्य होते हैं। निस्सन्देह, वे प्रत्येक काल तथा परिस्थिति में सर्वत्र हैं, लेकिन माया के आवरण से प्रच्छन्न होने के कारण सामान्य व्यक्ति को लगता है कि ईश्वर नहीं है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥