श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 24

 
श्लोक
तस्मात्सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।
भावमासुरमुन्मुच्य यया तुष्यत्यधोक्षज: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अतएव; सर्वेषु—समस्त; भूतेषु—जीवों पर; दयाम्—दया; कुरुत—दिखालाओ; सौहृदम्—मैत्री; भावम्—भाव, प्रवृत्ति; आसुरम्—असुरों का (जो मित्रों तथा शत्रुओं को पृथक् करते हैं); उन्मुच्य—त्याग कर; यया—जिससे; तुष्यति—प्रसन्न होता है; अधोक्षज:—भगवान् जो इन्द्रियों की अनभूति के परे है ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव हे असुरों से उत्पन्न मेरे प्यारे तरुण मित्रो, तुम सब ऐसा करो कि ऐसे भगवान्, जो भौतिक ज्ञान की धारणा से परे हैं, वे तुम पर प्रसन्न हों। तुम अपनी आसुरी प्रकृति छोड़ दो और शत्रुता या द्वैत रहित होकर कर्म करो। सभी जीवों में भक्ति जगाकर उन पर दया प्रदर्शित करो और इस प्रकार उनके हितैषी बनो।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१८.५५) में भगवान् कहते हैं—भक्त्या माम् अभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वत:—मनुष्य केवल भक्ति से परमेश्वर को यथारूप में समझ सकता है। प्रह्लाद महाराज ने अन्तत: अपने असुर सहपाठियों को शिक्षा दी कि वे प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत विज्ञान का उपदेश देकर भक्ति की विधि स्वीकार करें। उपदेश देना (प्रचार करना) भगवान् की सर्वोत्तम सेवा है। जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत के उपदेश कार्य की इस सेवा में लग जाता है उससे भगवान् तुरन्त ही अतीव प्रसन्न होते हैं। इसकी पुष्टि स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (१८.६९) में में की है—न च तस्मान् मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:—इस संसार में न तो उससे बढक़र प्रिय मेरा दास है, न भविष्य में कभी इससे बढक़र प्रिय होगा। यदि कोई भगवान् के यश तथा उनकी श्रेष्ठता का उपदेश करके कृष्णभावनामृत को फैलाने का प्रयास निष्ठापूर्वक करता है, तो भले ही वह अपूर्ण रूप से शिक्षित क्यों न हो, वह भगवान् का सर्वप्रिय दास बन जाता है। यह भक्ति है। ज्योंही शत्रु तथा मित्र का भेद-भाव किये बिना मानवता के लिए वह सेवा करता है त्योंही भगवान् प्रसन्न होते हैं और उसके जीवन का उद्देश्य पूरा हो जाता है। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रत्येक व्यक्ति को उपदेश दिया है कि वह गुरु-भक्त बने और कृष्णभावनामृत का प्रचार करे (यारे देख, तारे कह ‘कृष्ण’-उपदेश )। भगवान् की अनुभूति करने का यह सरलतम उपाय है। ऐसे उपदेश कार्य से उपदेशक तुष्ट होता है और जिन्हें उपदेश दिया जाता है वे भी तुष्ट हो जाते हैं। सम्पूर्ण विश्व में शान्ति लाने की विधि यही है—
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह परमेश्वर सम्बन्धी ज्ञान के इन तीन सूत्रों को समझे कि वे परम भोक्ता हैं, कि वे प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं तथा वे सबों के श्रेष्ठ सुहृद तथा सखा हैं। उपदेशक को ये सत्य स्वयं समझने चाहिए और सबों को इन्हीं का उपदेश देना चाहिए। तब सारे विश्व में शान्ति रहेगी।

इस श्लोक में सौहृदम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। सामान्यतया लोग कृष्णभावनामृत से अनजान हैं, अतएव उनका हितैषी बनने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह उन्हें बिना किसी भेद-भाव के कृष्णभावनामृत की शिक्षा दे। चूँकि भगवान् विष्णु हर एक के अन्तस्तल में विद्यमान हैं, अतएव प्रत्येक शरीर विष्णु का मन्दिर है। मनुष्य को चाहिए कि इस ज्ञान का दुरुपयोग दरिद्र नारायण जैसे शब्दों के बहाने से न करे। यदि नारायण दरिद्र अर्थात् गरीब मनुष्य के घर में वास करते हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि वे दरिद्र हो गये हैं। वे सर्वत्र रहते हैं—दरिद्र के घर में और धनी के घर में भी किन्तु सभी परिस्थितियों में वे नारायण बने रहते हैं। यह सोचना कि वे निर्धन या धनी हो जाते हैं भौतिक अनुमान है। वे सदैव षड्ऐश्वर्यपूर्ण—अर्थात् वे सदा छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण रहते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥