श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 5

 
श्लोक
ततो यतेत कुशल: क्षेमाय भवमाश्रित: ।
शरीरं पौरुषं यावन्न विपद्येत पुष्कलम् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—अतएव; यतेत—प्रयत्न करना चाहिए; कुशल:—बुद्धिमान मनुष्य जो जीवन के अन्तिम लक्ष्य में रुचि रखता हो; क्षेमाय—जीवन के असली लाभ के लिए या भव-बन्धन से मुक्ति के लिए; भवम् आश्रित:—जो भौतिक संसार में है; शरीरम्—शरीर; पौरुषम्—पुरुष का; यावत्—जब तक; न—नहीं; विपद्येत—असफल होता है; पुष्कलम्—हृष्ट-पुष्ट ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव इस संसार में रहते हुए (भवम् आश्रित:) भले तथा बुरे में भेद करने में सक्षम व्यक्ति को चाहिए कि जब तक शरीर हृष्ट-पुष्ट रहे और विनष्ट होने से चिन्ताग्रस्त न हो तब तक वह जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करे।
 
तात्पर्य
 जैसाकि प्रह्लाद महाराज ने इस अध्याय के प्रारम्भ में कहा है—कौमार आचरेत् प्राज्ञ:। प्राज्ञ: शब्द उस व्यक्ति को बताता है, जो अनुभवी है तथा भले-बुरे की पहचान कर सकता है। ऐसे व्यक्ति को अपनी आर्थिक उन्नति के लिए कुत्ते-बिल्ली की तरह कार्य करते हुए इस अमूल्य मानव जीवन तथा अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
इस श्लोक के भवम् आश्रित: के स्थान पर भयम् आश्रित: पाठ भी उपलब्ध है, किन्तु हम चाहे जिस पाठ का अर्थ ग्रहण करें, निष्कर्ष वही निकलता है। भयम् आश्रित: सूचित करता है कि भौतिकतावादी जीवन-शैली सदैव भय से पूर्ण है क्योंकि पद-पद पर संकट बना रहता है। भौतिकतावादी जीवन चिन्ता तथा भय (भयम् ) से पूर्ण है। इसी प्रकार भवम् आश्रितम् पाठ स्वीकार करने पर भवम् अनावश्यक झंझट तथा समस्याओं का सूचक है। कृष्णभावनामृत के अभाव में मनुष्य भवम् में आ पड़ता है जहाँ वह निरन्तर जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि से चिन्तित रहता है। इस तरह मनुष्य निश्चित रूप से चिन्ताग्रस्त बना रहता है। मानव समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इस प्रकार की सामाजिक प्रणाली में विभक्त तो होना चाहिए, किन्तु हर एक व्यक्ति भक्ति में प्रवृत्त हो सकता है। यदि कोई भक्ति के बिना रहना चाहता है, तो उसके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र होने का कोई अर्थ नहीं निकलता। कहा जाता है स्थानाद् भ्रष्टा:पतन्त्यध:—कोई चाहे उच्चवर्ग का हो या निम्न वर्ग का, कृष्णभावनामृत के अभाव में उसका पतन निश्चित है। विज्ञ पुरुष अपने पद से च्युत होने के प्रति सदैव भयभीत रहता है। यह विधान है। मनुष्य को अपने उच्च पद से नीचे नहीं गिरना चाहिए। जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य तभी तक प्राप्त किया जा सकता है जब तक शरीर हृष्ट-पुष्ट रहता है। अतएव हमें इस तरह रहना चाहिए कि हम मन तथा बुद्धि से स्वस्थ एवं पुष्ट रहें जिससे हम जीवन-लक्ष्य एवं समस्याओं से भरे हुए जीवन के बीच अन्तर कर सकें। विचारवान् व्यक्ति को उचित-अनुचित में अन्तर करना सीख कर इस तरह से कर्म करना और जीवन-लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥