श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 8

 
श्लोक
दुरापूरेण कामेन मोहेन च बलीयसा ।
शेषं गृहेषु सक्तस्य प्रमत्तस्यापयाति हि ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
दुरापूरेण—जो कभी पूरा नहीं होता; कामेन—भौतिक जगत को भोगने की प्रबल इच्छा से; मोहेन—मोह से; च—भी; बलीयसा—जो बलिष्ठ तथा दुर्जेय है; शेषम्—जीवन के बचे हुए वर्ष; गृहेषु—गृहस्थ जीवन में; सक्तस्य—अत्यधिक आसक्त का; प्रमत्तस्य—पागल का; अपयाति—व्यर्थ बिता देता है; हि—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 जिसके मन तथा इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं वह अतृप्त कामेच्छाओं तथा प्रबल मोह के कारण पारिवारिक जीवन में अधिकाधिक आसक्त होता जाता है। ऐसे पागल मनुष्य के जीवन के शेष वर्ष भी व्यर्थ जाते हैं, क्योंकि वह इन वर्षों में भी अपने को भक्ति में नहीं लगा सकता।
 
तात्पर्य
 यह जीवन के सौ वर्षों का लेखा-जोखा है। यद्यपि इस युग में सामान्यत: सौ वर्ष की आयु सम्भव नहीं है, फिर भी यदि किसी को इतनी आयु मिल भी जाये तो गणना के अनुसार पचास वर्ष सोने में व्यर्थ जाते हैं, बीस वर्ष बचपन तथा किशोरावस्था में और बीस वर्ष अशक्तता (जरा व्याधि ) में निकल जाते हैं। इस तरह केवल कुछ ही वर्ष बच रहते हैं लेकिन ये वर्ष भी गृहस्थ जीवन में अत्यधिक आसक्त रहने से ईश्वरभावनामृत के बिना ही व्यर्थ बीत जाते हैं। अतएव मनुष्य को जीवन के प्रारम्भिक काल में पूर्ण ब्रह्मचारी बनने, फिर यदि वह गृहस्थ बनता है, तो विधि-विधानों का पालन करते हुए इन्द्रिय-निग्रह में सिद्ध बनने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। गृहस्थ जीवन के बाद वानप्रस्थ जीवन स्वीकार करके
जंगल जाना चाहिए और तब संन्यास ले लेना चाहिए। यही जीवन की पूर्णता है। जो लोग जीवन के प्रारम्भ से ही अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर पाते (अजितेन्द्रिय ) उन्हें केवल इन्द्रिय-तृप्ति के लिए ही शिक्षित किया जाता है जैसाकि हम पाश्चात्य देशों में देख चुके हैं। इस प्रकार एक सौ वर्ष की पूरी आयु व्यर्थ और दुरुपयोग में जाती है। मृत्यु के समय जब मनुष्य दूसरे शरीर में देहान्तरण करता है, तो यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य का ही शरीर मिले। एक सौ वर्ष के अन्त में जो व्यक्ति तपस्यामय जीवन में मनुष्य की तरह कर्म नहीं करता रहता वह कूकर-सूकर या बिल्लियों के शरीर को पुन: धारण करता है। अतएव कामेच्छाओं तथा इन्द्रिय-तृप्ति का यह जीवन अत्यन्त विपदाग्रस्त है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥