श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 6: प्रह्लाद द्वारा अपने असुर सहपाठियों को उपदेश  »  श्लोक 9

 
श्लोक
को गृहेषु पुमान्सक्तमात्मानमजितेन्द्रिय: ।
स्‍नेहपाशैर्द‍ृढैर्बद्धमुत्सहेत विमोचितुम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
क:—कौन सा; गृहेषु—गृहस्थ जीवन में; पुमान्—मनुष्य; सक्तम्—अत्यधिक आसक्त; आत्मानम्—स्वयं, आत्मा; अजित- इन्द्रिय:—जिसने कभी इन्द्रियों को वश में नहीं किया; स्नेह-पाशै:—स्नेह की रस्सियों से; दृढै:—अत्यन्त शक्तिशाली; बद्धम्— हाथ तथा पैर बाँधा हुआ; उत्सहेत—समर्थ है; विमोचितुम्—भव-बन्धन से छुड़ाने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा कौन मनुष्य होगा जो अपनी इन्द्रियों को वश में करने में असमर्थ होने के कारण गृहस्थ जीवन से अत्यधिक आसक्त होकर अपने आपको मुक्त कर सके? आसक्त गृहस्थ अपनों (पत्नी, बच्चे तथा अन्य सम्बन्धी) के स्नेह-बन्धन से अत्यन्त दृढ़तापूर्वक बँधा रहता है।
 
तात्पर्य
 प्रह्लाद महाराज का पहला प्रस्ताव था—कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतान् इह— पर्याप्त बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन के प्रारम्भ से ही अर्थात् बाल्यकाल से ही अन्य सारे कार्यों को छोडक़र भक्ति कार्यों के अभ्यास में अपने शरीर का उपयोग करे। धर्मान् भागवतान् का अर्थ है भगवान् के साथ सम्बन्ध पुन: जागृत करने का धार्मिक सिद्धान्त। इस कार्य के लिए साक्षात् कृष्ण उपदेश देते हैं—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज—अन्य सारे कर्तव्यों को त्याग कर मेरी शरण में आओ। इस भौतिक संसार में रहते हुए हम अनेक वादों के नाम पर अनेकानेक कर्तव्यों को गढ़ते रहते हैं, किन्तु हमारा वास्तविक कर्तव्य तो अपने आपको जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि से मुक्त करना है। इसके लिए सर्वप्रथम भव-बन्धन से और विशेष रूप से गृहस्थ जीवन से मुक्त होना चाहिए। गृहस्थ जीवन वास्तव में भौतिकता से आसक्त व्यक्ति के लिए विधि-विधानों के अन्तर्गत इन्द्रिय-तृप्ति का एक प्रकार का लाइसेंस है। अन्यथा गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं।
गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के पूर्व मनुष्य को गुरु के संरक्षण में उसके स्थान या गुरुकुल में ब्रह्मचारी के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। ब्रह्मचारी गुरुकुले वसन् दान्तो गुरोर्हितम् (भागवत ७.१२.१)। ब्रह्मचारी को प्रारम्भ से ही सिखाया जाता है कि गुरु के लाभ के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दे। ब्रह्मचारी को उपदेश दिया जाता है कि वह सभी स्त्रियों को माता कहकर घर-घर जाकर भिक्षा माँगे और जो कुछ एकत्र करे उसे वह गुरु को लाकर दे दे। इस प्रकार वह अपनी इन्द्रियों को वश में करना तथा प्रत्येक वस्तु को गुरु को समर्पित करना सीखता है। पूर्णतया प्रशिक्षित होने पर यदि वह चाहता है, तो उसे विवाह करने दिया जाता है। इस प्रकार वह सामान्य गृहस्थ नहीं होता जिसने केवल अपनी इन्द्रियों को तृप्त करना सीख लिया है। प्रशिक्षित गृहस्थ धीरे-धीरे गृहस्थ जीवन त्याग कर जंगल जा सकता है, जिससे वह आध्यात्मिक जीवन में अधिकाधिक प्रबुद्ध हो सके और अन्तत: संन्यास ले ले। प्रह्लाद महाराज ने अपने पिता को बताया कि समस्त भौतिक चिन्ताओं से मुक्त होने के लिए मनुष्य को जंगल में जाना चाहिए। हित्वात्मपातं गृहम् अन्धकूपम्। मनुष्य को अपना घर-बार छोड़ देना चाहिए, क्योंकि यह भौतिक संसार के घोर अंधकारमय भागों में नीचे जाने के लिए स्थान है। अतएव पहला उपदेश यह है कि मनुष्य अपना गृहस्थ जीवन त्याग दे (गृहम् अन्धकूपम् )। किन्तु यदि वह अनियंत्रित इन्द्रियों के कारण गृहस्थ जीवन के अन्धे कुएँ में बना रहना अच्छा समझता है, तो वह अपनी पत्नी, बच्चे, नौकर, घर, धन इत्यादि की प्रेम-रस्सियों से अधिकाधिक जकड़ता जाता है। ऐसे मनुष्य को भौतिक बंधन से मुक्ति नहीं मिल सकती। अतएव बच्चों को बचपन से ही उच्चकोटि का ब्रह्मचारी बनने की शिक्षा दी जानी चाहिए। तभी भविष्य में वे गृहस्थ जीवन का परित्याग कर पाएँगे।

भगवद्धाम वापस जाने के लिए मनुष्य को भौतिक आसक्ति से पूर्णतया मुक्त होना चाहिए। अतएव भक्तियोग का अर्थ है वैराग्य विद्या—ऐसी कला जो भौतिक भोग के प्रति अरुचि उत्पन्न करने में सहायक होती है।

वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित:।

जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥

“भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति करने से मनुष्य को अहैतुक ज्ञान तथा जगत से वैराग्य प्राप्त हो जाता है।” (भागवत १.२.७) यदि कोई जीवन के प्रारम्भ से ही भक्ति में लग जाता है, तो वह सरलता से वैराग्य विद्या या अनासक्ति प्राप्त करता है और जितेन्द्रिय अर्थात् इन्द्रियों का नियंत्रक बन जाता है। जो अपने को पूर्णरूपेण भक्ति में लगाता है, वह गोस्वामी या स्वामी अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी कहलाता है। गोस्वामी हुए बिना किसी को संन्यास नहीं ग्रहण करना चाहिए। इन्द्रिय-भोग की प्रबल प्रवृत्ति ही भौतिक शरीर का कारण है। बिना पूर्ण ज्ञान के भौतिक भोग से विरक्त नहीं हुआ जा सकता, किन्तु जब तक वह इस अवस्था को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक वह भगवद्धाम वापस जाने का पात्र नहीं होता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥