श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 11

 
श्लोक
इत्युक्तस्तां विहायेन्द्रो देवर्षेर्मानयन्वच: ।
अनन्तप्रियभक्त्यैनां परिक्रम्य दिवं ययौ ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; उक्त:—सम्बोधित होकर; ताम्—उसको; विहाय—छोड़ कर; इन्द्र:—स्वर्ग का राजा; देव-ऋषे:—नारद मुनि के; मानयन्—मानते हुए, सम्मान करते हुए; वच:—शब्दों का; अनन्त-प्रिय—भगवान् के प्रिय; भक्त्या—भक्ति से; एनाम्— इसको (स्त्री को); परिक्रम्य—परिक्रमा करके; दिवम्—स्वर्ग लोक को; ययौ—वापस चला गया ।.
 
अनुवाद
 
 जब परम सन्त नारद मुनि ने इस प्रकार कहा तो राजा इन्द्र ने नारद के वचनों का सम्मान करते हुए तुरन्त ही मेरी माता को छोड़ दिया। चूँकि मैं भगवद्भक्त था, अतएव सब देवताओं ने मेरी माता की परिक्रमा की और तब वे सभी अपने अपने स्वर्गधाम को वापस चले गये।
 
तात्पर्य
 यद्यपि राजा इन्द्र तथा अन्य देवता महापुरुष हैं, किन्तु वे नारद मुनि के इतने आज्ञाकारी हैं कि राजा इन्द्र ने प्रह्लाद महाराज सम्बन्धी मुनि के वचनों को तुरन्त स्वीकार कर लिया। यह परम्परा पद्धति द्वारा समझना कहलाता है। इन्द्र तथा देवता यह नहीं जानते थे कि हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु के गर्भ में एक महान् भक्त है, किन्तु उन्होंने नारद मुनि
के प्रामाणिक कथन को स्वीकार कर लिया और तुरन्त ही उस गर्भिणी स्त्री की परिक्रमा करके उस भक्त को सम्मान प्रदान किया। परम्परा पद्धति द्वारा भगवान् तथा भक्त को समझना ज्ञान की विधि है। ईश्वर तथा उनके भक्त के विषय में सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को चाहिए कि प्रामाणिक भक्त के कथनों को स्वीकार करे और समझने का प्रयत्न करे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥