श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 13

 
श्लोक
तथेत्यवात्सीद्देवर्षेरन्तिके साकुतोभया ।
यावद्दैत्यपतिर्घोरात्तपसो न न्यवर्तत ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—ऐसा ही हो; इति—इस प्रकार; अवात्सीत्—रहती रही; देव-ऋषे:—देवर्षि नारद के; अन्तिके—निकट; सा—वह (मेरी माता); अकुतो-भया—किसी भी प्रकार के भय के बिना; यावत्—जब तक; दैत्य-पति:—मेरे पिता असुरराज हिरण्यकशिपु ने; घोरात्—अत्यन्त कठिन; तपस:—तपस्या; न—नहीं; न्यवर्तत—बन्द कर दिया ।.
 
अनुवाद
 
 देवर्षि नारद के उपदेशों को मानकर मेरी माता बिना किसी प्रकार के भय के उनकी देख- रेख में तब तक रहती रही जब तक मेरे पिता दैत्यराज अपनी घोर तपस्या से मुक्त नहीं हो गये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥