श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 14

 
श्लोक
ऋषिं पर्यचरत्तत्र भक्त्या परमया सती ।
अन्तर्वत्नी स्वगर्भस्य क्षेमायेच्छाप्रसूतये ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषिम्—नारद मुनि की; पर्यचरत्—सेवा करती रही; तत्र—वहाँ (आश्रम में); भक्त्या—श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक; परमया— परम; सती—आज्ञाकारी स्त्री; अन्तर्वत्नी—गर्भवती; स्व-गर्भस्य—अपने गर्भ के; क्षेमाय—कल्याण के लिए; इच्छा— इच्छानुसार; प्रसूतये—सन्तान उत्पन्न करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 मेरी माता गर्भवती होने के कारण अपने गर्भ की सुरक्षा चाहती थीं और चाहती थीं कि पति के आगमन के बाद सन्तान उत्पन्न हो। इस तरह वे नारद मुनि के आश्रम पर रहती रहीं जहाँ वे अत्यन्त भक्तिपूर्वक नारद मुनि की सेवा करती रहीं।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत (९.१९.१७) में में कहा गया है—
मात्रा स्वस्रा दुहिता वा नाविविक्तासनो भवेत्।

बलवान् इन्द्रिग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥

“मनुष्य को चाहिए कि वह स्त्री के साथ, चाहे उसकी माता, बहन या पुत्री ही क्यों न हो, एकान्त में न रहे।” यद्यपि एकान्त स्थान में पुरुष को स्त्री के साथ रहने के लिए पूरी तरह वर्जित किया गया है फिर भी नारद मुनि ने प्रह्लाद महाराज की तरुणी माता को आश्रय दिया जो अत्यन्त भक्ति तथा श्रद्धा से उनकी सेवा करती रहीं। तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि नारद मुनि ने वैदिक आदेशों का उल्लंघन किया? निश्चय ही नहीं। ऐसे आदेश संसारी प्राणियों के लिए हैं, नारद तो संसारी श्रेणी से परे हैं। वे महान् सन्त हैं और दिव्य पद पर स्थित हैं। अतएव स्वयं तरुण होते हुए भी वे एक तरुणी स्त्री को शरण देकर उसकी सेवा स्वीकार कर सकते थे। हरिदास ठाकुर ने भी एक वेश्या तरुणी से रात्रि के गहन अंधकार में बातें की थीं, लेकिन वह स्त्री उनके मन को विचलित न कर पाई। उल्टे, वह हरिदास ठाकुर के आशीर्वाद से शुद्ध भक्तिन या वैष्णवी बन गई। किन्तु सामान्य लोगों को ऐसे महान् भक्तों का अनुकरण नहीं करना चाहिए। उन्हें स्त्रियों की संगति से दूर रहकर विधि-विधानों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। किसी को नारद मुनि या हरिदास ठाकुर का अनुकरण नहीं करना चाहिए। कहा गया है—वैष्णवेर क्रिया-मुद्रा विज्ञे ना बुझय। बड़ा से बड़ा विद्वान भी वैष्णव के आचरण को नहीं समझ सकता। कोई भी बिना भय के किसी वैष्णव की शरण में जा सकता है। अतएव पिछले श्लोक में स्पष्ट कहा गया है देवर्षेरन्तिके साकुतोभया—प्रह्लाद महाराज की माता कयाधु सभी प्रकार के भय से रहित होकर नारद मुनि के संरक्षण में रहती रहीं। इसी तरह नारद मुनि अपने दिव्य पद के कारण उस तरुणी के साथ अविचल भाव से रहते रहे। नारद मुनि, हरिदास ठाकुर तथा ऐसे ही आचार्य जिन्हें भगवान् के यश का प्रचार करने की विशेष शक्ति प्राप्त है कभी भौतिक पद तक नीचे नहीं उतर सकते। अतएव यह सर्वथा वर्जित है कि आचार्य को सामान्य मनुष्य माना जाये (गुरुषु नरमति:)।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥