श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 2

 
श्लोक
श्रीप्रह्राद उवाच
पितरि प्रस्थितेऽस्माकं तपसे मन्दराचलम् ।
युद्धोद्यमं परं चक्रुर्विबुधा दानवान्प्रति ॥ २ ॥ H
 
शब्दार्थ
श्री-प्रह्राद: उवाच—प्रह्लाद महाराज ने कहा; पितरि—असुर पिता हिरण्यकशिपु के; प्रस्थिते—यहाँ से जाने पर; अस्माकम्— हमारे; तपसे—तपस्या करने के लिए; मन्दर-अचलम्—मन्दराचल नामक पर्वत पर; युद्ध-उद्यमम्—युद्ध करने का उद्योग; परम्—महान्; चक्रु:—सम्पन्न किया; विबुधा:—इन्द्र इत्यादि देवताओं ने; दानवान्—असुरों के; प्रति—प्रति ।.
 
अनुवाद
 
 प्रह्लाद महाराज ने कहा : जब हमारे पिता हिरण्यकशिपु कठिन तपस्या करने के लिए मन्दराचल पर्वत चले गये तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र इत्यादि देवताओं ने युद्ध में सारे असुरों का दमन करने का घोर प्रयास किया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥