श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 21

 
श्लोक
स्वर्णं यथा ग्रावसु हेमकार:
क्षेत्रेषु योगैस्तदभिज्ञ आप्नुयात् ।
क्षेत्रेषु देहेषु तथात्मयोगै-
रध्यात्मविद् ब्रह्मगतिं लभेत ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
स्वर्णम्—सोने को; यथा—जिस प्रकार; ग्रावसु—स्वर्ण खनिज के पत्थरों में; हेम-कार:—स्वर्ण के विषय में जानने वाला, विशेषज्ञ; क्षेत्रेषु—सोने की खानों में; योगै:—विभिन्न विधियों द्वारा; तत्-अभिज्ञ:—जानकार जो यह जानता है कि सोना कहाँ है; आप्नुयात्—सरलता से प्राप्त कर लेता है; क्षेत्रेषु—भौतिक खेतों में; देहेषु—मनुष्य शरीरों तथा शेष चौरासी लाख योनियों में; तथा—उसी प्रकार; आत्म-योगै:—आध्यात्मिक विधियों से; अध्यात्म-वित्—आत्मा तथा पदार्थ के अन्तर को समझने में पटु; ब्रह्म-गतिम्—आध्यात्मिक जीवन में सिद्धि; लभेत—प्राप्त कर सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 एक दक्ष भूविज्ञानी समझ सकता है कि सोना कहाँ पर है और वह उसे स्वर्णखनिज में से विविध विधियों द्वारा निकाल सकता है। इसी प्रकार आध्यात्मिक रूप से अग्रसर व्यक्ति यह समझ सकता है कि शरीर के भीतर किस तरह आध्यात्मिक कण विद्यमान रहते हैं और इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन द्वारा वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है। फिर भी जिस प्रकार एक अनाड़ी यह नहीं समझ पाता कि सोना कहाँ पर है, उसी प्रकार जिस मूर्ख व्यक्ति ने आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन नहीं किया वह यह नहीं समझ सकता कि शरीर के भीतर आत्मा किस तरह विद्यमान रह सकता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर आध्यात्मिक ज्ञान सम्बन्धी एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया गया है। मूर्ख लोग, जिनमें तथाकथित ज्ञानी, दार्शनिक तथा विज्ञानी सम्मिलित हैं, शरीर के भीतर आत्मा के अस्तित्व को नहीं समझ सकते क्योंकि उनमें आध्यात्मिक ज्ञान का अभाव रहता है। वेदों का आदेश है—तद् विज्ञानार्थं स गुरुम् एवाभिगच्छेत्—आध्यात्मिक ज्ञान समझने के लिए प्रामाणिक गुरु के पास जाना चाहिए। जब तक कोई भूगर्भविज्ञान में प्रशिक्षित न हुआ हो, वह पत्थर में सोने की पहचान नहीं कर सकता। इसी प्रकार जब तक कोई मनुष्य गुरु द्वारा प्रशिक्षित नहीं हो जाता वह आत्मा तथा पदार्थ के विषय में कुछ नहीं समझ सकता। यहाँ पर कहा गया है—योगैस्तद् अभिज्ञ:। इससे सूचित होता है कि जिसका सम्बन्ध आध्यात्मिक ज्ञान से रहता है, वह समझ सकता है कि शरीर के भीतर आध्यात्मिक आत्मा है। किन्तु जिसमें पशु-बुद्धि रहती है और आध्यात्मिक संस्कृति रहती ही नहीं वह इसे नहीं समझ सकता। एक दक्ष खनिजवेत्ता या भूगर्भशास्त्री यह समझ सकता है कि सोना कहाँ-कहाँ है और उसे निकालने के लिए वह धन लगा सकता है, एवं खनिज में से रासायनिक विधि से सोना निकाल लेता है। उसी तरह दक्ष अध्यात्मविद् (तत्त्ववेत्ता) भी समझ सकता है कि पदार्थ के भीतर आत्मा कहाँ है। जिसे प्रशिक्षण प्राप्त नहीं हुआ होता वह सोना तथा पत्थर में अन्तर नहीं बता सकता। इसी प्रकार जिन मूर्खों तथा धूर्तों ने दक्ष गुरु से यह नहीं सीखा कि आत्मा क्या है और पदार्थ क्या है, वह शरीर के भीतर आत्मा के अस्तित्व को नहीं समझ सकता। ऐसे ज्ञान को समझने के लिए उस मनुष्य को योग प्रणाली में या अन्तत: भक्ति योग प्रणाली में प्रशिक्षित होना चाहिए। जैसाकि भगवद्गीता (१८.५५) में कहा गया है—भक्त्या मामभिजानाति। जब तक कोई भक्तियोग की शरण नहीं ग्रहण करता तब तक वह शरीर के भीतर आत्मा के अस्तित्व को नहीं समझ सकता, अतएव भगवद्गीता (२.१३) निम्नलिखित शिक्षा सिखाने से प्रारम्भ होती है—
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

“जिस प्रकार इस शरीर में देहधारी आत्मा निरन्तर बचपन से युवावस्था में फिर वृद्धावस्था में जाता है उसी प्रकार आत्मा मृत्यु के समय दूसरे शरीर में चला जाता है। स्वरूपसिद्ध जीव ऐसे परिवर्तन से मोहग्रस्त नहीं होता।” इस प्रकार पहला उपदेश है कि शरीर के भीतर आत्मा रहता है और एक शरीर से दूसरे में देहान्तर करता रहता है। आध्यात्मिक ज्ञान का यह शुभारम्भ है। जो व्यक्ति इस ज्ञान को समझने में दक्ष नहीं होता अथवा इसे समझने की परवाह नहीं करता वह देहात्मबुद्धि में पाशविक जीवन की विचारधारा में पड़ा रहता है, जिसकी पुष्टि श्रीमद्भागवत में की गई है (यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुके...स एव गोखर:)। मानव समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भगवद्गीता के उपदेशों को समझा चाहिए क्योंकि यही एक साधन है, जिससे कोई आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है और स्वत: इस मिथ्या भ्रामक ज्ञान को त्याग सकता है, जिसके कारण वह सोचता है “मैं यह शरीर हूँ और इस शरीर से सम्बन्धित सारी वस्तुएँ मेरी हैं (अहं ममेति )।” कूकरों की सी इस धारणा को अविलम्ब त्यागना होगा। मनुष्य को आत्मा तथा परमात्मा या ईश्वर को समझने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि ये परम्परा सम्बन्धित हैं। इस प्रकार जीवन की समस्याएँ हल करके मनुष्य भगवद्धाम वापस जा सकता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥