श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 22

 
श्लोक
अष्टौ प्रकृतय: प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणा: ।
विकारा: षोडशाचार्यै: पुमानेक: समन्वयात् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
अष्टौ—आठ; प्रकृतय:—भौतिक शक्तियाँ; प्रोक्ता:—कही गयी हैं; त्रय:—तीन; एव—निश्चय ही; हि—निश्चित; तत्-गुणा:— भौतिक शक्ति के गुण; विकारा:—रूपान्तर, दोष; षोडश—सोलह; आचार्यै:—अधिकारियों द्वारा; पुमान्—जीव; एक:— एक; समन्वयात्—समन्वय से ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् की आठ भिन्न भौतिक शक्तियों, प्रकृति के तीन गुणों तथा सोलह विकारों (ग्यारह इन्द्रियों तथा पाँच स्थूल तत्त्व यथा पृथ्वी तथा जल) के अन्तर्गत एक ही आत्मा साक्षी के रूप में विद्यमान रहता है। अतएव सारे महान् आचार्यों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि आत्मा इन्हीं भौतिक तत्त्वों द्वारा बद्ध है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पिछले श्लोक में बताया जा चुका है—क्षेत्रेषु देहेषु तथात्मयोगैरध्यात्मविद् ब्रह्मगतिं लभेत—आध्यात्मिक रूप से अग्रसर व्यक्ति यह समझ सकता है कि शरीर के भीतर किस तरह आध्यात्मिक कण विद्यमान रहते हैं और इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान के अनुशीलन द्वारा वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है। जो बुद्धिमान पुरुष शरीर के भीतर आत्मा का अनुसन्धान करने में पटु है उसे उन आठ बहिरंगा शक्तियों को समझना चाहिए जो भगवद्गीता (७.४) में सूचीबद्ध हैं—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।

अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

“भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार—ये आठों मेरी भिन्न भौतिक शक्तियाँ हैं। भूमि में सारे इन्द्रियबोध के विषय सम्मिलित हैं—रूप, रस, गन्ध, शब्द तथा स्पर्श। गुलाब की सुगंध, मीठे फल का स्वाद तथा अन्य जो कुछ हम चाहते हैं, वह सब भूमि के ही अन्तर्गत आता है। जैसाकि श्रीमद्भागवत (१.१०.४) में कहा गया है—सर्वकामदुघा मही—पृथ्वी (मही) में हमारी सारी आवश्यक वस्तुएँ हैं। इस प्रकार भूमि या पृथ्वी में सारे इन्द्रियबोध के विषय हैं। स्थूल भौतिक तत्त्व तथा सूक्ष्मतत्त्व (मन, बुद्धि तथा अहंकार) मिलकर सम्पूर्ण भौतिक शक्ति बनाते हैं।

इसी सम्पूर्ण भौतिक शक्ति में तीन गुण हैं। ये हैं—सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण। ये आत्मा से नहीं, अपितु भौतिक शक्ति से सम्बद्ध हैं। इन्हीं तीन तत्त्वों की अन्योन्य क्रिया से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा उनका नियंत्रक मन प्रकट होते हैं। तब इन गुणों के अनुसार जीवात्मा विभिन्न प्रकार के कर्मों को विभिन्न प्रकार के ज्ञान, विचार, अनुभूति तथा इच्छा से सम्पन्न करने का अवसर प्राप्त करता है। इस प्रकार शारीरिक यंत्र कार्य करना प्रारम्भ करता है।

इसका समुचित विश्लेषण बड़े-बड़े आचार्यों द्वारा, विशेष रूप से देवहूति-पुत्र भगवान् कृष्ण के अवतार कपिल द्वारा, सांख्य योग में हुआ है। यहाँ पर इसका संकेत आचार्यै शब्द से हुआ है। हमें चाहिए कि जो वैध आचार्य न हो उसका अनुगमन न करें। आचार्यवान् पुरुषो वेद—दक्ष आचार्य की शरण ग्रहण करने पर ही सत्य को पूरी तरह समझा जा सकता है।

जीव अकेला है लेकिन शरीर कई भौतिक तत्त्वों का संघटन है। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि ज्योंही जीव भौतिक तत्त्वों के इस संघटन को छोड़ देता है त्योंही वह पदार्थ का निरा संघट्ट बन जाता है। गुणात्मक रूप से पदार्थ एक है और आत्मा भी परमात्मा के साथ एक है। परमात्मा एक है तथा आत्मा (जीव) भी एक है, किन्तु आत्मा को व्यष्टि भौतिक शक्ति के संयोग का नियन्ता माना जाता है, जबकि परमेश्वर समग्र भौतिक शक्ति का नियंत्रक है। जीव अपने शरीर विशेष का स्वामी है और अपने कर्मों के अनुसार विविध सुख-दुख भोगता है, किन्तु परम पुरुष परमात्मा यद्यपि एक है, किन्तु वह विभिन्न शरीरों में व्यष्टि के रूप में उपस्थित है।

भौतिक शक्ति वस्तुत: चौबीस तत्त्वों में विभाजित है। आत्मा अथवा शरीर का स्वामी पच्चीसवाँ तत्त्व है और इन सबों के ऊपर परमात्मा रूप में भगवान् विष्णु हैं, जो छब्बीसवें तत्त्व हैं। जब कोई इन छब्बीसों तत्त्वों को जान लेता है, तो वह अध्यात्मवित् बन जाता है। जैसाकि भगवद्गीता (१३.३) में कहा गया है—क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानम्—क्षेत्र (शरीर) तथा आत्मा और परमात्मा मिलकर असली ज्ञान की सृष्टि करते हैं। जब तक मनुष्य यह नहीं समझ लेता कि आत्मा से भगवान् का नित्य सम्बन्ध है तब तक उसका ज्ञान अधूरा रहता है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (७.१९) में हुई है—

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

“अनेक जन्मों तथा मृत्युओं के बाद जो वास्तव में ज्ञानी है, वह मुझे समस्त कारणों का कारण जानते हुए मेरी शरण में आता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है।” प्रत्येक वस्तु, चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक, उन वासुदेव की विभिन्न शक्तियों से युक्त है जिनके अधीन आत्मा है, जो परमेश्वर का ही अंश है। इस पूर्ण ज्ञान को समझ लेने पर मनुष्य भगवान् की शरण ग्रहण करता है (वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:)।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥