श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 24

 
श्लोक
अन्वयव्यतिरेकेण विवेकेनोशतात्मना ।
स्वर्गस्थानसमाम्नायैर्विमृशद्भ‍िरसत्वरै: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
अन्वय—प्रत्यक्षत:; व्यतिरेकेण—तथा अप्रत्यक्ष रूप से; विवेकेन—प्रौढ़ विवेकता; उशता—शुद्ध हुआ; आत्मना—मन से; स्वर्ग—सृष्टि; स्थान—पालन; समाम्नायै:—तथा विनाश द्वारा; विमृशद्भि:—गम्भीर विश्लेषण करने वालों के द्वारा; असत्- वरै:—अत्यन्त धीर ।.
 
अनुवाद
 
 धीर तथा दक्ष पुरुषों को चाहिए कि आत्मा का अनुसन्धान वैश्लेषिक अध्ययन के द्वारा शुद्ध हुए मनों से करें जो सृष्टि, पालन तथा संहार होने वाली सारी वस्तुओं से आत्मा के सम्बन्ध तथा अन्तर के रूप में किया गया हो।
 
तात्पर्य
 धीर व्यक्ति वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा स्वयं ही शरीर तथा आत्मा के अन्तर को जान सकता है। उदाहरणार्थ, जो व्यक्ति अपने शरीर में अपने हाथ, सिर इत्यादि पर विचार करता है, वह निश्चय ही आत्मा तथा शरीर के अन्तर को समझ सकता है। कोई यह नहीं कहता “मैं सिर हूँ।” सभी यह कहते हैं “मेरा सिर।” अतएव दो संज्ञाएँ हैं—‘सिर तथा मैं।’ वे एक नहीं हैं, यद्यपि वे एक संघट्ट प्रतीत होते हैं।
कोई यह तर्क कर सकता है “जब हम शरीर का विश्लेषण करते हैं, तो उसमें हमें सिर, हाथ, पाँव, पेट, रक्त, अस्थियाँ, मूत्र, मल इत्यादि मिलते हैं किन्तु जब सबों पर विचार हो चुका होता है, तो फिर आत्मा कहाँ है?” किन्तु गम्भीर मनुष्य इस वैदिक उपदेश का लाभ उठाता है।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। (तैत्तिरीय उपनिषद् ३.१.१) इस प्रकार वह समझ सकता है कि सिर, हाथ तथा पूरा शरीर आत्मा के आधार पर बड़ा हुआ है। यदि आत्मा भीतर है, तो शरीर, सिर, हाथ, पैर बढ़ते हैं, अन्यथा नहीं। मृत बालक नहीं बढ़ता क्योंकि उसमें आत्मा विद्यमान नहीं है। यदि शरीर के सतर्क विश्लेषण के बाद भी किसी को आत्मा का अस्तित्व न दिखे, तो यह अज्ञान ही है। भला भौतिकतावादी कार्यकलापों में पूरी तरह संलग्न व्यक्ति किस प्रकार उस आत्मा को समझ सकता है, जो एक बाल के अगले भाग के दस हजारवें भाग जितना छोटा है? ऐसा व्यक्ति मूर्खतावश सोचता है कि भौतिक शरीर रसायनों के मेल से बड़ा हुआ है, यद्यपि वह इन तत्त्वों को ढूँढ़ नहीं पाता। किन्तु वेद हमें बताते हैं कि रासायनिक मेल से प्राण नहीं बनता; प्राण तो आत्मा तथा परमात्मा है और शरीर उसी प्राण के ही आधार पर बढ़ता है। वृक्ष में लगा फल वृक्ष की उपस्थिति के कारण ही बढ़ता है और उसमें छह प्रकार के परिवर्तन होते हैं। यदि वृक्ष न हो तो फल के बढऩे तथा परिपक्व होने का प्रश्न ही न उठे। अतएव शरीर के अस्तित्व के परे शरीर के भीतर परमात्मा तथा आत्मा है। भगवद्गीता में बताये गये आध्यात्मिक ज्ञान की यह पहली जानकारी है। देहिनोऽस्मिन् यथा देहे—शरीर का अस्तित्व परमेश्वर तथा उन्हीं के अंशस्वरूप जीव की उपस्थिति के कारण होता है। इसकी आगे व्याख्या भगवद्गीता (९.४) में स्वयं भगवान् ने की है—

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

“यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सारे जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ।” परमात्मा सर्वत्र उपस्थित है। वेदों का आदेश है—सर्वं खल्विदं ब्रह्म—प्रत्येक वस्तु ब्रह्म है या कि ब्रह्म की शक्ति का विस्तार है। सूत्रे मणिगणा इव—प्रत्येक वस्तु भगवान् पर अवलम्बित है, जिस प्रकार मोती सूत्र द्वारा गूँथे रहते हैं। यह सूत्र प्रधान ब्रह्म है। यह परम कारण परमेश्वर है, जिस पर प्रत्येक वस्तु आधारित है (मत्त: परतरं नान्यत )। इस प्रकार हमें चाहिए कि आत्मा तथा परमात्मा का अध्ययन करें जिस पर यह सारा भौतिक विराट् जगत आश्रित है। इसकी व्याख्या इस वैदिक कथन से हो जाती है—

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥