श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 30-31

 
श्लोक
गुरुशुश्रूषया भक्त्या सर्वलब्धार्पणेन च ।
सङ्गेन साधुभक्तानामीश्वराराधनेन च ॥ ३० ॥
श्रद्धया तत्कथायां च कीर्तनैर्गुणकर्मणाम् ।
तत्पादाम्बुरुहध्यानात तल्लिङ्गेक्षार्हणादिभि: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
गुरु-शुश्रूषया—प्रामाणिक गुरु की सेवा द्वारा; भक्त्या—श्रद्धा तथा भक्ति से; सर्व—समस्त; लब्ध—भौतिक लाभों के; अर्पणेन—अर्पण से (गुरु को या गुरु के माध्यम से कृष्ण को); च—तथा; सङ्गेन—संगति से; साधु-भक्तानाम्—भक्तों तथा साधु पुरुषों की; ईश्वर—भगवान् की; आराधनेन—पूजा से; च—तथा; श्रद्धया—अत्यन्त श्रद्धापूर्वक; तत्-कथायाम्— भगवान् की कथाओं में; च—तथा; कीर्तनै:—यशोगान द्वारा; गुण-कर्मणाम्—भगवान् के दिव्य गुणों तथा कर्मों का; तत्— उसके; पाद-अम्बुरुह—चरणकमलों पर; ध्यानात्—ध्यान से; तत्—उसका; लिङ्ग—स्वरूप (अर्चाविग्रह); ईक्ष—दर्शन; अर्हण-आदिभि:—तथा पूजा द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को प्रामाणिक गुरु स्वीकार करना चाहिए और अत्यन्त भक्ति तथा श्रद्धा से उसकी सेवा करनी चाहिए। उसके पास जो कुछ भी हो उसे गुरु को अर्पित करना चाहिए और सन्त पुरुषों तथा भक्तों की संगति में भगवान् की पूजा करनी चाहिए, श्रद्धापूर्वक भगवान् के यश का श्रवण करना चाहिए, भगवान् के दिव्य गुणों तथा कार्यकलापों का यशोगान करना चाहिए, सदैव भगवान् के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए तथा शास्त्र एवं गुरु के आदेशानुसार भगवान् के अर्चाविग्रह की पूजा करनी चाहिए।
 
तात्पर्य
 पिछले श्लोक में बताया गया है कि जिस विधि से भगवान् के प्रति प्रेम तथा स्नेह तुरन्त बढ़े वह इस भव-बन्धन से मुक्त होने के हजारों उपायों में सर्वश्रेष्ठ है। कहा गया है—धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्—वास्तव में धर्म के सिद्धान्तों का सत्य अत्यन्त गुह्य होता है। फिर भी यदि कोई धर्म के नियमों को वास्तव में स्वीकार कर ले तो इसे सरलता से समझा जा सकता है। जैसाकि कहा गया है—धर्मं तु साक्षात् भगवत्प्रणीतम्—धर्म की विधि परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित है, क्योंकि वे परमसत्ता हैं। पिछले श्लोक में भी इसे भगवतोदित: शब्द द्वारा सूचित किया गया है। भगवान् के आदेश अच्युत हैं और उनके लाभ पूर्णत: निश्चित हैं। उनके आदेशनुसार धर्म का पूर्ण स्वरूप भक्तियोग है, जैसाकि इस श्लोक में बताया गया है।
भक्तियोग का अभ्यास करने के पूर्व प्रामाणिक गुरु स्वीकार करना चाहिए। श्रील रूप गोस्वामी अपने भक्तिरसामृत सिन्धु (१.२.७४-७५) में उपदेश दिया है—

गुरुपादाश्रयस्तस्मात् कृष्णदीक्षादिशिक्षणम्।

विश्रम्भेण गुरो: सेवा साधुवर्त्मानुवर्तनम् ॥

सद्धर्म पृच्छा भोगादित्याग: कृष्णस्य हेतवे।

मनुष्य का पहला कर्तव्य है कि प्रामाणिक गुरु स्वीकार करे। छात्र या शिष्य को अत्यन्त जिज्ञासु होना चाहिए, उसे सनातन धर्म के विषय में पूर्ण सत्य जानने के लिए उत्सुक रहना चाहिए। गुरु शुश्रूषया शब्दों का अर्थ है कि वह स्वयं गुरु को शारीरिक सुविधाएँ प्रदान करके जैसे स्नान करते, वस्त्र बदलते, सोते, खाते समय सहायता पहुँचा कर उनकी सेवा करे। यह गुरु शुश्रूषणम् कहलाता है। शिष्य दास की भाँति गुरु की सेवा करे और उसके पास जो कुछ भी हो उसे गुरु को समार्पित कर दे। प्राणै: अर्थैर्धिया वाचा। प्रत्येक व्यक्ति के पास जीवन, सम्पत्ति, बुद्धि तथा वाणी होती है और इन सबों को गुरु के माध्यम से भगवान् को अर्पित कर देना चाहिए। गुरु को सब कुछ कर्तव्य के रूप में अर्पित कर देना चाहिए, किन्तु यह भेंट भौतिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए बनावटी ढंग से नहीं, अपितु हृदय से की जानी चाहिए। यह भेंट अर्पण कहलाती है। इसके साथ ही शिष्टाचार सीखने तथा भक्ति का समुचित आचरण करने के लिए उसे भक्तों तथा सन्त पुरुषों के साथ रहना चाहिए। इस सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि गुरु को जो कुछ भी अर्पित किया जाये वह प्रेम तथा स्नेहपूर्वक किया जाये, भौतिक स्तवन के लिए नहीं। इसी प्रकार यह भी संस्तुति की गई है कि मनुष्य भक्तों की संगति करे, किन्तु उसे तनिक विवेक से काम लेना होगा। वास्तव में साधु को अपने आचरण में सन्त जैसा होना चाहिए (साधव: सदाचारा:)। जब तक वह आदर्श आचरण में दृढ़ नहीं रहता उसका साधु पद पूर्ण नहीं है। अतएव एक वैष्णव या साधु को आदर्श आचरण में दृढ़ और पूर्ण रहना चाहिए। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि वैष्णव का सम्मान वैष्णव के योग्य होना चाहिए जिसका अर्थ है कि उसकी सेवा की जानी चाहिए तथा स्तवन किया जाना चाहिए। किन्तु यदि वह संगति के उपयुक्त व्यक्ति नहीं है, तो उसकी संगति नहीं करनी चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥