श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 34

 
श्लोक
निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान्
वीर्याणि लीलातनुभि: कृतानि ।
यदातिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदं
प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
निशम्य—सुनकर; कर्माणि—दिव्य कार्यकलापों को; गुणान्—आध्यात्मिक गुणों का; अतुल्यान्—असामान्य (जो सामान्य पुरुष में नहीं दिखते); वीर्याणि—अत्यन्त शक्तिमान; लीला-तनुभि:—अनेक लीला स्वरूपों के द्वारा; कृतानि—किये गये; यदा—जब; अतिहर्ष—अत्यन्त प्रसन्नता के कारण; उत्पुलक—रोमांच; अश्रु—आँखों में आँसू; गद्गदम्—अवरुद्ध कण्ठ; प्रोत्कण्ठ:—खुले स्वर से; उद्गायति—उच्च स्वर से कीर्तन करता है; रौति—रोता है; नृत्यति—नाचता है ।.
 
अनुवाद
 
 जो भक्ति के पद पर आसीन हो जाता है, वह निश्चय ही इन्द्रियों का नियंत्रक है और इस तरह वह एक मुक्त पुरुष हो जाता है। जब ऐसा मुक्त पुरुष या शुद्ध भक्त विभिन्न लीलाएँ करने के लिए भगवान् के अवतारों के दिव्य गुणों तथा कार्यकलापों के विषय में सुनता है, तो उसके शरीर में रोमांच हो आता है, उसकी आँखों से आँसू झरने लगते हैं और आध्यात्मिक अनुभूति के कारण उसकी वाणी अवरुद्ध हो जाती है। कभी वह नाचता है, तो कभी जोर-जोर से गाता है और कभी रोने लगता है। इस प्रकार वह अपने दिव्य हर्ष को व्यक्त करता है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के कार्यकलाप असामान्य होते हैं। उदाहरणार्थ, जब वे रामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए तो उन्होंने समुद्र पर पुल बनाने का असामान्य कार्य किया। इसी प्रकार जब भगवान् कृष्ण प्रकट हुए तो उन्होंने सात वर्ष की ही अवस्था में गोवर्धन पर्वत उठा लिया। ये असामान्य कार्य हैं। मूर्ख तथा धूर्त दिव्य पद को प्राप्त नहीं हुए होते
लोग जो वे भगवान् के इन असामान्य कार्यों को पौराणिक या काल्पनिक मानते हैं। किन्तु जब मुक्त व्यक्ति या भक्त भगवान् के इन असामान्य कार्यकलापों के विषय में सुनता है, तो वह तुरन्त ही आनन्द-विभोर हो उठता है और कीर्तन करने, नाचने तथा जोर-जोर से प्रसन्न होकर रोने के लक्षण प्रकट करता है। भक्त तथा अभक्त के बीच यही अन्तर है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥