श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 44

 
श्लोक
किमु व्यवहितापत्यदारागारधनादय: ।
राज्यकोशगजामात्यभृत्याप्ता ममतास्पदा: ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
किम् उ—क्या कहा जाये; व्यवहित—पृथक् किया गया; अपत्य—सन्तानें; दार—पत्नियाँ; अगार—निवासस्थान; धन— सम्पत्ति; आदय:—इत्यादि; राज्य—राज्य; कोश—खजाना; गज—बड़े बड़े हाथी तथा घोड़े; अमात्य—मंत्री; भृत्य—नौकर- चाकर; आप्ता:—सम्बन्धी; ममता-आस्पदा:—घनिष्ठ सम्बन्धियों के झूठे स्थान या घर (अपने लोग) ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि शरीर को अन्तत: मल या मिट्टी में बदल जाना है अतएव इस शरीर से सम्बन्धित साज-सामान—यथा पत्नियाँ, घर, धन, बच्चे, सम्बन्धी, नौकर-चाकर, मित्र, राज्य, खजाने, पुश तथा मंत्रियों—से क्या प्रयोजन? ये सभी नश्वर हैं। इनके विषय में और अधिक क्या कहा जा सकता है?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥