श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 54

 
श्लोक
दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रिय: शूद्रा व्रजौकस: ।
खगा मृगा: पापजीवा: सन्ति ह्यच्युततां गता: ॥ ५४ ॥
 
शब्दार्थ
दैतेया:—हे असुरो; यक्ष-रक्षांसि—यक्ष तथा राक्षस कहलाने वाले; स्त्रिय:—स्त्रियाँ; शूद्रा:—श्रमिक वर्ग; व्रज-ओकस:— ग्रामीण ग्वाले; खगा:—पक्षी; मृगा:—पशु; पाप-जीवा:—पापी जीव; सन्ति—हो सकते हैं; हि—निश्चय ही; अच्युतताम्— अच्युत भगवान् के गुण को; गता:—प्राप्त ।.
 
अनुवाद
 
 हे मित्रो! हे असुरपुत्रो, प्रत्येक व्यक्ति जिसमें तुम भी शामिल हो, (यक्ष तथा राक्षस) अज्ञानी स्त्रियाँ, शूद्र, ग्वाले, पक्षी, निम्नतर पशु तथा पापी जीव अपना-अपना मूल शाश्वत आध्यात्मिक जीवन पुन: प्राप्त कर सकते हैं और भक्तियोग के सिद्धान्तों को स्वीकार करने मात्र से सदा-सदा इसी तरह बने रह सकते हैं।
 
तात्पर्य
 भक्तों को अच्युत गोत्र अर्थात् भगवान् का वंश कहा जाता है। भगवान् अच्युत कहलाते हैं जैसाकि भगवद्गीता में इंगित किया गया है (सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत् )। भगवान् इस जगत में अच्युत हैं क्योंकि वे परम आध्यात्मिक पुरुष हैं। इसी प्रकार भगवान् के अंश होने के कारण जीव भी अच्युत बन सकते हैं। यद्यपि प्रह्लाद की माता बद्ध अवस्था में थीं और असुर की पत्नी थीं, लेकिन यक्ष, राक्षस, स्त्रियाँ, शूद्र यहाँ तक कि पक्षी तथा अन्य निम्नतर जीव भी अच्युत गोत्र को प्राप्त हो सकते हैं। यही सर्वोच्च सिद्धि है। जिस प्रकार कृष्ण कभी च्युत नहीं होते उसी प्रकार जब हम अपनी आध्यात्मिक चेतना, कृष्णभावनामृत, को पुन: जाग्रत कर लेते हैं, तो हम पुन: भवसागर में नहीं गिरते। मनुष्य को चाहिए कि परम अच्युत श्रीकृष्ण की स्थिति को समझे जिन्होंने भगवद्गीता (४.९) में कहा है : जन्म कर्म च में दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

“हे अर्जुन! जो मेरे प्राकट्य तथा कार्यों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह अपना शरीर त्यागने के बाद इस जगत में पुन: जन्म नहीं लेता बल्कि मेरे नित्य धाम को प्राप्त करता है।” मनुष्य को चाहिए कि अच्युत को समझे और यह भी समझे कि हम उनसे किस प्रकार सम्बद्ध हैं। उसे भगवान् की सेवा करनी चाहिए। यही जीवन की पूर्णता है। श्रील मध्वाचार्य कहते हैं—अच्युततां च्युतिवर्जनम्। अच्युतता शब्द उस मनुष्य का सूचक है, जो इस जगत में कभी नहीं गिरता, अपितु भगवान् की सेवा में सदा लगा हुआ वैकुण्ठ लोक में रहता आ रहा है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥