श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 55

 
श्लोक
एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंस: स्वार्थ: पर: स्मृत: ।
एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत्सर्वत्र तदीक्षणम् ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
एतावान्—इतना; एव—निश्चय ही; लोके अस्मिन्—इस जगत में; पुंस:—जीव का; स्व-अर्थ:—असली हित; पर:—दिव्य; स्मृत:—माना जाने वाला; एकान्त-भक्ति:—अनन्य भक्ति; गोविन्दे—गोविन्द के प्रति; यत्—जो; सर्वत्र—सभी तरह; तत्- ईक्षणम्—गोविन्द या कृष्ण के साथ सम्बन्ध को देखना ।.
 
अनुवाद
 
 इस भौतिक जगत में समस्त कारणों के कारण गोविन्द के चरणकमलों के प्रति सेवा करना और सर्वत्र उनका दर्शन करना ही एकमात्र जीवन-लक्ष्य है। जैसाकि समस्त शास्त्रों ने बतलाया है मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य इतना ही है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आगत सर्वत्र तदीक्षणम् शब्द भक्ति की चरम सिद्धि को बताते हैं जिसमें प्रत्येक वस्तु गोविन्द के कार्यकलापों से सम्बद्ध दिखती है। अतएव उच्च भक्त (महाभागवत) कभी भी किसी वस्तु को गोविन्द से असम्बद्ध नहीं देखता।
स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्ति।

सर्वत्र हय निज इष्टदेव-स्फूर्ति ॥

“महाभागवत प्रत्येक चल तथा अचल वस्तु को देखता है लेकिन वह उनके वास्तविक रूपों को नहीं देखता। प्रत्युत वह जहाँ कहीं भी देखता है, वहीं उसे परमेश्वर का रूप प्रकट दिखता है।” (चैतन्य-चरितामृत, मध्य ८.२७४) यहाँ तक कि इस जगत में भी भक्त भौतिकरूप से प्रकट होने वाली वस्तुओं को नहीं देखता, इसके बदले में वह हर वस्तु में गोविन्द के दर्शन करता है। जब कोई भक्त किसी वृक्ष या मनुष्य को देखता है, तो वह उन्हें गोविन्द रूप में देखता है। गोविन्दमादिपुरुषम्—

गोविन्द प्रत्येक वस्तु के आदि स्रोत हैं।

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द विग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“गोविन्द कहलाने वाले कृष्ण परम नियन्ता है। सच्चिदानन्द रूप हैं। वे सबों के उद्गम हैं। उनका कोई अन्य उद्गम नहीं हैं, क्योंकि वे समस्त कारणों के कारण हैं।” (ब्रह्म-संहिता ५.१) एक पूर्ण भक्त की पहचान यही है कि वह इस ब्रह्माण्ड में गोविन्द के सर्वत्र दर्शन करता है, यहाँ तक कि एक परमाणु में भी (अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थम् )। भक्त की यही पूर्ण दृष्टि है। इसीलिए कहा गया है—

नारायणमयं धीरा: पश्यन्ति परमार्थिन:।

जगद् धनमयं लुब्धा: कामुका: कामिनीमयम् ॥

भक्त हर एक को नारायण रूप में देखता है (नारायणमयम् )। प्रत्येक वस्तु नारायण की शक्ति का विस्तार है। जिस प्रकार लोभी को प्रत्येक वस्तु कमाई का साधन प्रतीत होती है और जिस प्रकार कामी को सारी वस्तु काम के लिए अनुकूल लगती हैं उसी तरह परम पूर्ण भक्त प्रह्लाद महाराज ने एक एत्थर के ख भे के भीतर भी नारायण को देखा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम किसी भ्रष्ट व्यक्ति द्वारा गढ़े गये दरिद्र नारायण शब्द को स्वीकार करें। वास्तव में जो नारायण का सर्वत्र दर्शन करता है, वह दरिद्र तथा धनी में कोई अन्तर नहीं करता। दरिद्र नारायण को चुनना और धनी नारायण का परित्याग—भक्त की यह दृष्टि नहीं होती प्रत्युत यह भौतिकतावादी व्यक्तियों की अपूर्ण दृष्टि है।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध के अन्तर्गत “प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा” नामक सातवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥