श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 7: प्रह्लाद ने गर्भ में क्या सीखा  »  श्लोक 9

 
श्लोक
श्रीइन्द्र उवाच
आस्तेऽस्या जठरे वीर्यमविषह्यं सुरद्विष: ।
आस्यतां यावत्प्रसवं मोक्ष्येऽर्थपदवीं गत: ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-इन्द्र: उवाच—राजा इन्द्र ने कहा; आस्ते—है; अस्या:—उसके; जठरे—उदर में; वीर्यम्—वीर्य; अविषह्यम्—असहनीय; सुर-द्विष:—देवताओं के शत्रु का; आस्यताम्—इसे रहने दें (हमारी कैद में); यावत्—जब तक; प्रसवम्—बच्चे का जन्म; मोक्ष्ये—मैं छोड़ दूँगा; अर्थ-पदवीम्—मेरे लक्ष्य का मार्ग; गत:—प्राप्त हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 राजा इन्द्र ने कहा : इस असुरपत्नी के गर्भ में उस असुर हिरण्यकशिपु का वीर्य है। अतएव इसे तब तक हमारे संरक्षण में रहने दें जब तक बच्चा उत्पन्न नहीं हो जाता। तब हम इसे छोड़ देंगे।
 
तात्पर्य
 स्वर्ग के राजा इन्द्र ने प्रह्लाद महाराज की माता को इसलिए बन्दी बनाना चाहा, क्योंकि उसने सोचा कि उसके गर्भ में दूसरा असुर, दूसरा हिरण्यकशिपु
बैठा है। अतएव सर्वोत्तम उपाय यही होगा कि जब यह बच्चा उत्पन्न हो तो उसे मार डाला जाये और तब स्त्री को मुक्त कर दिया जाये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥