श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीनारद उवाच
अथ दैत्यसुता: सर्वे श्रुत्वा तदनुवर्णितम् ।
जगृहुर्निरवद्यत्वान्नैव गुर्वनुशिक्षितम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-नारद: उवाच—श्री नारद मुनि ने कहा; अथ—तत्पश्चात्; दैत्य-सुता:—असुरों के पुत्र (प्रह्लाद महाराज के सहपाठी); सर्वे—सभी; श्रुत्वा—सुनकर; तत्—उससे (प्रह्लाद से); अनुवर्णितम्—भक्तिमय जीवन के विषय में कथन; जगृहु:—स्वीकार किया; निरवद्यत्वात्—उस उपदेश के श्रेष्ठ उपयोग के कारण; न—नहीं; एव—निस्सन्देह; गुरु-अनुशिक्षितम्—जो उनके गुरुओं ने पढ़ाया था ।.
 
अनुवाद
 
 नारद मुनि ने आगे कहा : सारे असुरपुत्रों ने प्रह्लाद महाराज के दिव्य उपदेशों की सराहना की और उन्हें अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक ग्रहण किया। उन्होंने षण्ड तथा अमर्क नामक अपने गुरुओं द्वारा दिये गये भौतिकतावादी उपदेशों का तिरस्कार कर दिया।
 
तात्पर्य
 यह प्रह्लाद महाराज जैसे शुद्ध भक्त के उपदेश का प्रभाव है। यदि भक्त योग्य हो, सत्यनिष्ठ हो और कृष्णभावनामृत के प्रति गम्भीर हो तथा यदि वह प्रामाणिक गुरु के उपदेशों का उसी तरह पालन करे जिस तरह प्रह्लाद महाराज नारद मुनि से प्राप्त उपदेशों का पालन अपना उपदेश देते समय कर रहे थे तो ऐसा उपदेश प्रभावशाली होता है। जैसाकि श्रीमद्भागवत (३.२५.२५) में कहा गया है : सतां प्रसङ्गान् मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायना: कथा:।
यदि कोई सत् अर्थात् शुद्ध भक्त द्वारा दिये गये प्रवचन को समझने का प्रयास करता है, तो वे उपदेश अत्यन्त कर्णप्रिय तथा हृदय को भले लगेंगे। इस तरह यदि कोई कृष्णभावनामृत ग्रहण करने के लिए प्रेरित होता है और अपने जीवन में इस विधि का अभ्यास करता है, तो वह निश्चित रूप से भगवद्धाम लौट जाने में सफल होता है। प्रह्लाद महाराज की कृपा से उनके सारे सहपाठी असुर-पुत्र वैष्णव हो गये। उन्हें अपने तथाकथित गुरुओं, षण्ड तथा अमक की बातें सुननी पसन्द नहीं आई जो उन्हें केवल कुटूनीति, राजनीति, आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति के लिए ऐसे ही विषयों की शिक्षा दे रहे थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥