श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 16

 
श्लोक
स विक्रमन् पुत्रवधेप्सुरोजसा
निशम्य निर्ह्रादमपूर्वमद्भ‍ुतम् ।
अन्त:सभायां न ददर्श तत्पदं
वितत्रसुर्येन सुरारियूथपा: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (हिरण्यकशिपु); विक्रमन्—अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए; पुत्र-वध-ईप्सु:—अपने ही पुत्र का वध करने का इच्छुक; ओजसा—अत्यन्त बलपूर्वक; निशम्य—सुनकर; निर्ह्रादम्—भयानक ध्वनि को; अपूर्वम्—पहले कभी न सुनी गई; अद्भुतम्—अत्यन्त अद्भुत; अन्त:-सभायाम्—सभा के भीतर; न—नहीं; ददर्श—देखा; तत्-पदम्—उस भयानक आवाज के स्रोत को; वितत्रसु:—भयभीत हुए; येन—जिस ध्वनि से; सुर-अरि-यूथ-पा:—असुरों के अन्य नेता (हिरण्यकशिपु ही नहीं) ।.
 
अनुवाद
 
 अपने पुत्र को मारने के इच्छुक हिरण्यकशिपु ने जो इस तरह अपना अद्वितीय शौर्य दिखला रहा था जब एक अद्भुत भीषण (घोर) ध्वनि सुनी जिसे इसके पूर्व उसने कभी नहीं सुना था। इसी ध्वनि को सुनकर अन्य असुरनायक भी भयभीत हुए। उस सभा में इस ध्वनि के उद्गम को कोई नहीं ढूँढ़ पाया।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.८) में कृष्ण यह कहकर अपनी व्याख्या करते हैं— रसोऽमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशि सूर्ययो:।
प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु ॥

“हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! मैं ही जल का स्वाद, सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश, वैदिक मंत्रों का ऊँ शब्द तथा आकाश एवं मनुष्य के पुरुषार्थ की ध्वनि हूँ।” यहाँ पर भगवान् ने आकाश में भीषण ध्वनि द्वारा (शब्द: खे ) सर्वत्र अपनी उपस्थिति प्रकट की। अब हिरण्यकशिपु जैसे असुर भगवान् की परम नियंत्रक शक्ति का अनुभव कर सके और इस प्रकार हिरण्यकशिपु भयभीत हो गया। मनुष्य चाहे कितना बलशाली क्यों न हो, वह वज्रपात की ध्वनि से सदैव भयभीत होता है। इसी प्रकार हिरण्यकशिपु तथा उसके सारे संगी असुर उस ध्वनि के रूप में उपस्थित भगवान् की उपस्थिति से भयभीत थे, यद्यपि वे उस ध्वनि के उद्गम का पता नहीं लगा पाये।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥