श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 17

 
श्लोक
सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं
व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मन: ।
अद‍ृश्यतात्यद्भ‍ुतरूपमुद्वहन्
स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
सत्यम्—सच; विधातुम्—सिद्ध करने के लिए; निज-भृत्य-भाषितम्—अपने दास के ही शब्दों को (प्रह्लाद महाराज द्वारा कहे गये शब्द कि भगवान् सर्वव्यापी हैं); व्याप्तिम्—उपस्थिति; च—तथा; भूतेषु—जीवों तथा तत्त्वों के मध्य; अखिलेषु—समस्त; च—तथा; आत्मन:—अपना; अदृश्यत—दिखाई पड़ा; अति—अत्यन्त; अद्भुत—अद्भुत; रूपम्—रूप को; उद्वहन्—धारण करके; स्तम्भे—ख भे में; सभायाम्—सभा के भीतर; न—नहीं; मृगम्—पशु; न—न तो; मानुषम्—मनुष्य ।.
 
अनुवाद
 
 अपने दास प्रह्लाद महाराज के वचनों को सिद्ध करने के लिए कि वे सत्य हैं—अर्थात् यह सिद्ध करने के लिए कि भगवान् सर्वत्र उपस्थित हैं, यहाँ तक कि सभा भवन के ख भे के भीतर भी हैं—भगवान् श्री हरि ने अपना अभूतपूर्व अद्भुत रूप प्रकट किया। यह रूप न तो मनुष्य का था, न सिंह का। इस प्रकार भगवान् उस सभाकक्ष में अपने अद्भुत रूप में प्रकट हुए।
 
तात्पर्य
 जब हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद महाराज से पूछा “तुम्हारा भगवान् कहाँ है? क्या वह इस ख भे में उपस्थित है?” तो प्रह्लाद महाराज ने निर्भीक होकर उत्तर दिया, “हाँ, मेरे भगवान् सर्वत्र उपस्थित हैं।” अतएव हिरण्यकशिपु को यह विश्वास दिलाने के लिए कि प्रह्लाद महाराज का कथन निर्भ्रान्त था, भगवान् उस ख भे से प्रकट हो गये। वे आधा सिंह तथा आधा मनुष्य के रूप में प्रकट हुए जिससे हिरण्यकशिपु यह नहीं जान पाया कि यह विराट दैव सिंह है या मनुष्य। प्रह्लाद के कथन की पुष्टि करके भगवान् ने सिद्ध कर दिया कि उनका भक्त कभी विनष्ट नहीं होता, जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है (कौन्तेय
प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति )। यद्यपि प्रह्लाद का असुर पिता उन्हें मार डालने की बार-बार धमकियाँ दे चुका था, किन्तु प्रह्लाद को विश्वास था कि वे मारे नहीं जा सकते, क्योंकि उनकी रक्षा करने वाले भगवान् हैं। ख भे से प्रकट होकर भगवान् ने मानो यह कहते हुए अपने भक्त को प्रोत्साहित किया हो “मत चिन्तित होओ। मैं यहाँ उपस्थित हूँ।” नृसिंह देव के रूप में प्रकट होकर भगवान् ने ब्रह्माजी के वचनों को भी रख लिया कि हिरण्यकशिपु का वध न तो किसी पशु के द्वारा होगा, न मनुष्य द्वारा। भगवान् ऐसे रूप में प्रकट हुए जो न तो पूरी तरह मनुष्य का, न सिंह का कहा जा सकता था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥