श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 24

 
श्लोक
अलक्षितोऽग्नौ पतित: पतङ्गमो
यथा नृसिंहौजसि सोऽसुरस्तदा ।
न तद्विचित्रं खलु सत्त्वधामनि
स्वतेजसा यो नु पुरापिबत् तम: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
अलक्षित:—अदृश्य; अग्नौ—अग्नि में; पतित:—गिरा हुआ; पतङ्गम:—पतंगा; यथा—जिस तरह; नृसिंह—भगवान् नृसिंह देव का; ओजसि—तेज में; स:—वह; असुर:—हिरण्यकशिपु; तदा—उस समय; न—नहीं; तत्—वह; विचित्रम्—अद्भुत; खलु—निस्सन्देह; सत्त्व-धामनि—सतोगुणी भगवान् में; स्व-तेजसा—अपने तेज से; य:—जो भगवान्; नु—निस्सन्देह; पुरा— प्राचीन काल में; अपिबत्—निगल लिया; तम:—भौतिक सृष्टि के भीतर अंधकार ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह एक बेचारा छोटा पतंगा बरबस अग्नि में गिरकर अदृश्य हो जाता है उसी तरह जब हिरण्यकशिपु ने तेजोमय भगवान् पर आक्रमण किया तो वह अदृश्य हो गया। यह आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि भगवान् सदैव सतोगुण की स्थिति में रहते हैं। प्राचीन काल में सृष्टि के समय वे अंधकारपूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हो गये थे और उसे उन्होंने अपने आध्यात्मिक तेज से प्रकाशित कर दिया था।
 
तात्पर्य
 भगवान् सदैव शुद्ध सत्त्व में स्थित रहते हैं। यह भौतिक जगत सामान्यत: तमोगुण द्वारा नियंत्रित होता है किन्तु आध्यात्मिक जगत भगवान् तथा उनके तेज की उपस्थिति के कारण तमो, रजो या दूषित सतोगुण के द्वारा होने वाले समस्त कल्मष से सर्वथा रहित है। यद्यपि इस जगत में भी ब्राह्म गुणों के रूप में सतोगुण का रंचमात्र पाया जाता है किन्तु कभी-कभी ऐसे गुण रजो तथा तमो गुणों के प्राबल्य के कारण अदृश्य हो जाते हैं। किन्तु भगवान् सदैव दिव्यत: स्थिर रहते हैं, अतएव रजो तथा तमोंगुण उनका स्पर्श भी नहीं कर पाते। जब भी भगवान् विद्यमान रहते हैं, तो तमोगुण के कारण कोई भी अज्ञान वहाँ टिक नहीं सकता। चैतन्य-चरितामृत (मध्य २२.३१) में कहा गया है—
कृष्ण—सूर्य-सम, माया हय अन्धकार।

याहाँ कृष्ण, ताहाँ नाहि मायार अधिकार ॥

“भगवान् प्रकाश हैं और अविद्या अंधकार है। जहाँ भगवान् रहते हैं वहाँ अविद्या नहीं रहती।” यह भौतिक जगत तमोगुण से और आध्यात्मिक जीवन के अज्ञान से पूर्ण है, किन्तु भक्तियोग से यह अज्ञान जाता रहता है। भगवान् का प्राकट्य इसलिए हुआ, क्योंकि प्रह्लाद महाराज ने भक्तियोग प्रदर्शित किया और ज्योंही भगवान् प्रकट हुए त्योंही हिरण्यकशिपु के रजो तथा तमोंगुण का प्रभाव जाता रहा, क्योंकि भगवान् का शुद्ध सतोगुण या ब्रह्मतेज प्रधान हो गया। उस प्रखर तेज के समक्ष हिरण्यकशिपु अदृश्य हो गया, अर्थात् उसका प्रभाव नगण्य हो गया। शास्त्र में यह बताने के लिए कि भौतिक जगत का अंधकार किस प्रकार भाग जाता है उदाहरण प्राप्त है। जब ब्रह्मा गर्भोदकशायी विष्णु के उदर से निकले—कमल से उत्पन्न हुए तो उन्होंने देखा कि सब कुछ अंधकारमय है, किन्तु जब उन्हें भगवान् से ज्ञान प्राप्त हो गया तो सब कुछ स्पष्ट हो गया जिस तरह रात्रि से सूर्य प्रकाश में आने पर प्रत्येक वस्तु स्पष्ट दिखने लगती है। मुख्य बात तो यह है कि जब तक हम प्रकृति के गुणों में रहते हैं तब तक हम सदैव अंधकार में होते हैं। यह अंधकार भगवान् की उपस्थिति के बिना दूर नहीं हो पाता जिस का आवाहन भक्तियोग विधि से किया जाता है। भक्तियोग से कल्मषविहीन दिव्य स्थिति उत्पन्न होती है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥