श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 7: भगवद्-विज्ञान  »  अध्याय 8: भगवान् नृसिंह द्वारा असुरराज का वध  »  श्लोक 26

 
श्लोक
स तस्य हस्तोत्कलितस्तदासुरो
विक्रीडतो यद्वदहिर्गरुत्मत: ।
असाध्वमन्यन्त हृतौकसोऽमरा
घनच्छदा भारत सर्वधिष्ण्यपा: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (हिरण्यकशिपु); तस्य—उस दिव्य (भगवान् नृसिंह) के; हस्त—हाथों से; उत्कलित:—छूट गया; तदा—उस समय; असुर:—दैत्यराज हिरण्यकशिपु; विक्रीडत:—खेलते हुए; यद्वत्—के सदृश; अहि:—सर्प; गरुत्मत:—गरुड़ का; असाधु— बुरा; अमन्यन्त—मान लिया; हृत-ओकस:—जिनके धाम हिरण्यकिशपु ने छीन लिये थे; अमरा:—देवगण; घन-च्छदा:— बादलों के पीछे स्थित; भारत—हे भरतपुत्र; सर्व-धिष्ण्य-पा:—समस्त स्वर्गलोकों के शासक ।.
 
अनुवाद
 
 हे भरत के महान् पुत्र युधिष्ठिर, जब नृसिंह देव ने हिरण्यकशिपु को अपने हाथ से छूट जाने का अवसर दे दिया, जिस तरह से कभी-कभी गरुड़ साँप के साथ खिलवाड़ करते हुए उसे अपने मुँह से सरक जाने देता है, तो सारे देवताओं ने, जिनके निवास स्थान उनके हाथों से निकल चुके थे और जो असुर के भय से बादलों के पीछे छिपे थे, इस घटना को शुभ नहीं माना। निस्सन्देह, वे अत्यधिक विचलित थे।
 
तात्पर्य
 जब हिरण्यकिशपु नृसिंह के चंगुल में था और मार डाला जाने वाला था तो भगवान् ने उसे अपने चंगुल से सरक जाने का एक अवसर दिया। देवताओं ने इस घटना को पसन्द नहीं किया, क्योंकि वे हिरण्यकशिपु से अत्यधिक डरे हुए थे।
वे जानते थे कि यदि किसी तरह हिरण्यकशिपु भगवान् के हाथों से छूट निकला और उसने यह देख लिया कि देवता उसकी मृत्यु की अत्यन्त हर्ष के साथ प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो वह उनसे बदला लेगा। इसलिए वे अत्यधिक भयभीत थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥